Thursday, 20 March 2014

॥ गुरुस्तोत्र॥

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्‌।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ १॥

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ २॥

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ३॥

स्थावरं जङ्गमं व्याप्तं यत्किञ्चित्सचराचरम्‌।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ४॥

चिन्मयं व्यापि यत्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्‌।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ५॥

सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदाम्बुजः।
वेदान्ताम्बुजसूर्यो यः तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ६॥

चैतन्यश्शाश्वतश्शान्तः व्योमातीतो निरञ्जनः।
बिन्दुनादकलातीतः तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ७॥

ज्ञानशक्तिसमारूढः तत्त्वमालाविभूषितः।
भुक्तिमुक्तिप्रदाता च तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ८॥


अनेकजन्मसम्प्राप्तकर्मबन्धविदाहिने।
आत्मज्ञानप्रदानेन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ९॥

शोषणं भवसिन्धोश्च ज्ञापनं सारसम्पदः।
गुरोः पादोदकं सम्यक्‌ तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ १०॥

न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः।
तत्त्वज्ञानात्‌ परं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ११॥

मन्नाथः श्रीजगन्नाथः मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः।
मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ १२॥

गुरुरादिरनादिश्च गुरुः परमदैवतम्‌।
गुरोः परतरं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ १३॥

त्वमेव माता च पिता त्वमेव। त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव। त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥ १४॥


॥ इति श्रीगुरुस्तोत्रम्‌॥

गोरक्षपंचाक्षर जाप

गोरषनाथ लिंवस्वरूपं गउ गो प्रतिपालनं |
अगोचरं गहर गभीरं गकाराइ न्मो न्मो || १ ||
रहतंच निरालंबं अस्थंभं भवनं त्रियं |
राष राष श्रव भूतानं रकाराइ न्मो न्मो || २ ||
षकार इकयिस व्रह्मांडं षेचरं जगद गुरुं |
षेत्रपालं षडग वंसे षकाराइ न्मो न्मो || ३ ||
नाना सास समो दाइ नाना रूप प्रकासितं |
नाद विंद समो जोति नकाराइ न्मो न्मो || ४ ||
थापितं थल संसारं अलेषं अपारं अगोचरं |
थावरे जंगमे सचिवं थकाराइ न्मो न्मो || ५ ||
गकारं ग्यान संयुक्तं रकारं रूप लाछ्नं |
षकारं इकीस व्रह्मंडं नकारं नादि विंदए || ६ ||
थाकारं थानमानयो थिर थापन थर्पनं |
गोरषनाथ अक्षरं मंत्रं श्रवाधाराइ न्मो न्मो || ७ ||
ॐ गों गोराक्षनाथाय विद्महे शून्यपुत्राय धीमहि तन्नो
गोरक्ष निरंजनः प्रचोदयात् | आदेश आदेश शिवगोरक्ष ||
गोरक्षवालं गुरु शिष्यपालं शेषाहिमालं शशिखण्ड भालम |
कालस्यकालं जितजन्मजालं वन्दे जटालं जगदब्ज नालं ||

नौनाथरक्षा जाप

ॐ अवधूनाथ गोरष आवे, सिद्ध बाल गुदाई |
घोड़ा चोली आवे, आवे कन्थड़ वरदाई || १ ||
सिध कणेरी पाव आवे, आवे औलिया जालंधर |
अजै पाल गुरुदेव आवे, आवे जोगेसर मछंदर || २ ||
धूँधलीमल आवे, आवे गोपिचन्द निजततगहणा |
नौनाथ आवो सिधां सहत महाराजै !
मुझ रक्षा करणा || ३ ||

आदेश गायत्री जाप

ॐ नम आदेश गुरान्जीकूँ आदेश , ॐ आदेशाय विद्महे |
सोहं आदेशाय धीमहि नन्नो आदेशनाम प्रचोदयात् ||
आदेश नाम गायत्री जाप उठन्ते अनुभवदेवा |
सप्त दीप नव खण्डमें आदेश नामकी सेवा ||
आदेश नाम अनघड़की काया ररंकारमें झंकार समाया |
सोहंकारसे ॐ उपाया वज्र शरीर अमर करी काया ||
आदेश नाम अमृत रसमेवा आद जुगाद करूँ मै सेवा |
आदेश नाम अनघड़जीने भाख्या लख चौरासी पड़ता राख्या ||
आदेश नाम पाखान तराई आदेश नाम जपोरे भाई |
आदेश नाम जपन्ते देवा व्रह्मा विष्णु महेश्वर एवा ||
सिद्ध चौरासी नाथ नव जोगी आवा गमन कदे नहि भोगी |
राजा प्रजा जपै दिन राति दूध पूत घर संपति आति ||
आदेश नाम गायत्री सार जपो भौ उतरो पार |
आदेश नाम गायत्री उत्तम जपतांवार न कीजै जनम ||
इतना आदेश नाम गायत्री जाप सम्पूरणं सही |
अटल दलीचे वैठके श्रीनाथजी गुरुजी ने कही ||
नाथजी गुरुजी को आदेश आदेश |

महा ज्योति

प्रथम ज्योति महाकाली
(महाकाली)
ॐ निरन्जन निराकार अवगत पुरुष तत सार, तत सार मध्ये ज्योत ज्योत मध्ये परम ज्योत, परम ज्योत मध्ये उत्पन्न भई, माता शम्भु शिवानी काली, ओ काली काली महाकाली, कृष्ण वर्णी, शव वाहनी, रुद्र की पोषणी, हाथ खप्पर खडंग धारी, गले मुण्डमाल हंस मुखी | जिह्वा ज्वाला दन्त काली | मद्य मांस कारी श्मशान की रानी | मांस खाये रक्त - पी - पावे | भस्मन्ति माई जहां पर पाई तहां लगाई | सत की नाती धर्म की बेटी इन्द्र की साली काल की काली जोग की जोगिन, नागों की नागिन मन माने तो संग रमाई नहीं तो श्मशान फिरे अकेली ४ वीर अष्ट भैरी, घोर काली अघोर काली अजर बजर अमर काली भख जून निर्भय काली बला भख, दुष्ट को भख, काल भख पापी पाखण्डी को भख जती सती को रख, ओं काली तुम बाला ना वृद्धा, देव न दानव, नर या नारी देवीजी तुम तो हो परब्रह्मा काली |
क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं दक्षिणे हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं क्रीं क्रीं क्रीं स्वाहा,
द्वितीय ज्योति तारा त्रिकुटा तोतला प्रगटी |
(तारा)
ॐ आदि योग अनादि माया जहां पर ब्रह्माण्ड उत्पन्न भया | ब्रह्माण्ड समाया आकाश मण्डल तारा त्रिकुटा तोतला माता तीनों बसै ब्रह्म कपालि, जहां पर ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पत्ति, सूरज मुख तपे चंद्र मुख अमिरस पीवे, अग्नि मुख जले, आद कुंवारी हाथ खङग गल मुण्ड माल, मुर्दा मार ऊपर खड़ी देवी तारा | नीली काया पीली जटा, काली दन्त जिह्वा दबाया | घोर तारा अघोर तारा, दूध पूत का भण्डार भरा | पंच मुख करे हा हा ऽ:ऽ:कारा, डांकनी शाकिनी भूत पलिता सौ सौ कोस दूर भगाया | चंडी तारा फिरे ब्रह्मांडी तुम तो हों तीन लोक की जननी |
ॐ ह्रीं श्रीं फट्, ओं ऐं ह्रीं श्रीं हूं फट् |
तृतीय ज्योति त्रिपुर सुन्दरी प्रगटी |
(षोडशी - त्रिपुर सुन्दरी)
ॐ निरन्जन निराकार अवधू मूल द्वार में बन्ध लगाई पवन पलटे गगन समाई, ज्योति मध्ये ज्योत ले स्थिर हो भई ॐ मध्या: उत्पन्न भई उग्र त्रिपुरा सुन्दरी शक्ति आवो शिवघर बैठो, मन उनमन, बुध सिद्ध चित्त में भया नाद | तीनों एक त्रिपुर सुन्दरी भया प्रकाश | हाथ चाप शर धर एक हाथ अंकुश | त्रिनेत्रा अभय मुद्रा योग भोग की मोक्षदायिनी | इडा पिंगला सुषुम्ना देवी नागन जोगन त्रिपुर सुन्दरी | उग्र बाला, रुद्र बाला तीनों ब्रह्मपुरी में भया उजियाला | योगी के घर जोगन बाला, ब्रह्मा विष्णु शिव की माता |
श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौं ह्रीं श्रीं कं एईल
ह्रीं हंस कहल ह्रीं सकल ह्रीं सो:
ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं
चतुर्थ ज्योति भुवनेश्वरी प्रगटी |
(भुवनेश्वरी)
ॐ आदि ज्योत आनादि ज्योत, ज्योत मध्ये परम ज्योत - परम ज्योत मध्ये शिव गायत्री भई उत्पन्न, ॐ प्रात: समय उत्पन्न भई देवी भुवनेश्वरी | बाला सुन्दरी कर धर वर पाशांकुश अन्न्पुर्णी दुधपूत बल दे बालका ऋद्धि सिद्धि भण्डार भरे, बालकाना बल दे जोगी को अमर काया | १४ भुवन का राजपाट संभाला कटे रोग योगी का, दुष्ट को मुष्ट, काल कन्टक मार | योगी बनखण्ड वासा, सदा संग रहे भुवनेश्वरी माता |
ह्रीं
पंचम ज्योति छिन्नमस्ता प्रगटी |
(छिन्नमस्ता)
सत का धर्म सत की काया, ब्रह्म अग्नि में योग जमाया | काया तपाये जोगी (शिव गोरख) बैठा, नाभ कमल पर छिन्नमस्ता, चन्द्र सूर में उपजी सुषुम्नी देवी, त्रिकुटी महल में फिरे बाला सुन्दरी, तन का मुन्डा हाथ में लीन्हा, दाहिने हाथ में खप्पर धार्या | पी पी पीवे रक्त, बरसे त्रिकुट मस्तक पर अग्नि प्रजाली, श्वेत वर्णी मुक्त केशा कैची धारी | देवी उमा की शक्ति छाया, प्रलयी खाये सृष्टि सारी | चण्डी, चण्डी फिरे ब्रह्माण्डी भख भख बाला भख दुष्ट को मुष्ठ जाती, सती को रख, योगी घर जोगन बैठी, श्री शम्भुजती गोरखनाथ जी ने भाखी | छिन्नमस्ता जपो जाप, पाप कन्ट्न्ते आपो आप जो जोगी करे सुमिरण पाप पुण्य से न्यारा रहे | काल ना खाये |
श्रीं क्लीं ह्रीं ऐं वज्र वैरो चनीये हूँ हूँ फट् स्वाह: |

षष्टम् ज्योति भैरवी प्रगटी |
(भैरवी)
ॐ सती भैरवी भैरो काल यम जाने यम भूपाल तीन नेत्र तारा त्रिकुटी, गले में माला मुण्डन की | अभय मुद्रा पीये रुधिर नाशवन्ती ! काला खप्पर हाथ खन्जर, कालापीर धर्म धूप खेवन्ते वासना गई सातवे पाताल, सातवे पाताल मध्ये परमतत्व परमतत्व में जोत, जोत में परम जोत, परम जोत में भई उत्पन्न काल भैरवी, त्रिपुर भैरवी, समपत प्रदा भैरवी, कैलेश भैरवी, सिद्धा भैरवी, विध्वंसिनि भैरवी, चैतन्य भैरवी, कामेश्वरी भैरवी, षटकुटा भैरवी, नित्या भैरवी | जपा अजपा गोरक्ष जपन्ती यही मंत्र मत्स्येन्द्रनाथ जी को सदा शिव ने कहायी | ऋद्ध फूरो सिद्ध फूरो सत श्री शम्भुजती गुरु गोरक्षनाथ जी अनन्त कोटि सिद्धा ले उतरेगी काल के पार, भैरवी भैरवी खड़ी जिन शीश पर, दूर हाटे काल जन्जाल भैरवी अमंत्र बैकुण्ठ वासा | अमर लोक में हुवा निवासा |
"ॐ हस्त्रो हस्कलरो हस्त्रो:" |
सप्तम ज्योति धूमावती प्रगटी |
(धूमावती)
ॐ पाताल निरन्जन निराकार, आकाश मण्डल धुन्धुकार, आकाश दिशा से कौन आई, कौन रथ कौन असवार, आकाश दिशा से धूमावंती आई, काक ध्वजा का रथ अस्वार थरै धरत्री थरै आकाश, विधवा रुप लम्बे हाथ, लम्बी नाक कुटिल नेत्र दुष्टा स्वभाव, डमरु बाजे भद्रकाली, क्लेश कलह कालरात्रि | डंका डंकनी काल किट किटा हास्य करी | जीव रक्षन्ते जीव भक्षन्ते जाया जीया आकाश तेरा होये | धूमावन्तीपुरी में वास, न होती देवी न देव तहाँ न होती पूजा न पाती तहाँ न होती जात न जाती तब आये श्री शम्भुजती गुरु गोरक्षनाथ आप भयी अतीत |
ॐ धूं: धूं: धूमावती फट् स्वाह: |
अष्ठम ज्योति बगलामुखी प्रगटी |
(बगलामुखी)
ॐ सौ सौ सुता समुन्दर टापू, टापू में थापा सिंहासन पीला | सिंहासन पीले ऊपर कौन बैसे सिंहासन पीला ऊपर बगलामुखी बैसे, बगलामुखी के कौन संगी कौन साथी | कच्ची बच्ची काक - कुतीया - स्वान चिड़िया, ॐ बगला बाला हाथ मुग्दर मार, शत्रु ह्रदय पर स्वार तिसकी जिव्हा खिच्चै बाला | बगलामुखी मरणी करणी उच्चाटन धरणी, अनन्त कोटि सिद्धों ने मानी ॐ बगलामुखी रमे ब्रह्माण्डी मण्डे चन्द्र्सूर फिरे खण्डे खण्डे | बाला बगलामुखी नमो नमस्कार |
ॐ हृलीं ब्रह्मास्त्रायैं विदमहे स्तम्भनबाणायै
धीमहि तन्नो बगला प्रचोदयात्
नवमी ज्योति मातंगी प्रगटी |
(मातंगी)
ॐ गुरूजी शून्य शून्य महाशून्य, महाशून्य में ओंकार ॐकार में शिवम् शिवम् में शक्ति - शक्ति अपन्ते उहज आपो आपना, सुभय में धाम कमल में विश्राम, आसन बैठी, सिंहासन बैठी पूजा पूजो मातंगी बाला, शीश पर शशी अमिरस प्याला हाथ खड्ग नीली काया | बल्ला पर अस्वारी उग्र उन्मत मुद्राधारी, उद गुग्गुल पाण सुपारी, खीरे खाण्डे मद्य मांसे घृत कुण्डे सर्वांगधारी | बुन्द मात्रेन कडवा प्याला, मातंगी माता तृप्यन्ते तृप्यन्ते | ॐ मातंगी सुन्दरी, रुपवंती, कामदेवी, धनवंती, धनदाती, अन्नपूर्णी अन्न्दाती, मातंगी जाप मंत्र जपे काल का तुम काल को खाये | तिसकी रक्षा शम्भुजती गुरु गोरक्षनाथ जी करे |
ॐ ह्री क्लीं हूँ मातंग्यै फट् स्वाहा |
दसवीं ज्योति कमला प्रगटी |
(कमला)
ॐ अयोनी शंकर ॐकार रुप, कमला देवी सती पार्वती का स्वरुप | हाथ में सोने का कलश मुख से अभय मुद्रा | श्वेत वर्ण सेवा पूजा करे, नारद इन्द्रा | देवी देवत्या ने किया जय ओंकार | कमला देवी पूजो केशर पान सुपारी, चकमक चीनी फतरी तिल गुग्गल सहस्त्र कमलों का किया हवन | कहे गोरख, मंत्र जपो जाप जपो ऋद्धि सिद्धि की पहचान गंगा गौरजा पार्वती जान | जिसकी तीन लोक में भया मान | कमला देवी के चरण कमल को आदेश |
ॐ ह्रीं क्लीं कमला देवी फट् स्वाह:
सुनो पार्वती हम मत्स्येन्द्र पूता, आदिनाथ नाती, हम शिव स्वरुप उलटी थापना थापी योगी का योग, दस विद्या शक्ति जानो, जिसका भेद शिव शंकर ही पायो | सिद्ध योग मरम जो जाने विरला तिसको प्रसन्न भयी महाकालिका | योगी योग नित्य करे प्रात: उसे वरद भुवनेश्वरी माता | सिद्धासन सिद्ध, भया श्मशानी तिसके संग बैठी बगलामुखी | जोगी खड दर्शन को कर जानी, खुल गया ताला ब्रह्माण्ड भैरवी | नाभी स्थाने उडीय्यान बांधी मनीपुर चक्र में बैठी, छिन्नमस्ता रानी | ॐकार ध्यान लाग्या त्रिकुटी, प्रगटी तारा बाला सुन्दरी | पाताल जोगन (कुण्डलिनी) गगन को चढ़ी, जहाँ पर बैठी त्रिपुर सुन्दरी | आलस मोड़े, निन्द्रा तोड़े तिसकी रक्षा देवी धूमावंती करें | हंसा जाये दसवें द्वारे देवी मातंगी का आवागमन खोजे | जो कमला देवी की धूनी चेताये तिसकी ऋद्धि सिद्धि से भण्डार भरे | जो दशविद्या का सुमिरण करे | पाप पुन्य से न्यारा रहे | योग अभ्यास से भये सिद्धा आवागमन निवराते | मन्त्र पढ़े सो नर अमर लोक में जायें | इतना दस महाविद्या मन्त्र जाप सम्पूर्ण भया | अनन्त कोट सिद्धों में, गोदावरी त्र्यम्बक क्षेत्र अनुपान शिला, अवलगढ़ पर्वत पर बैठ श्री शम्भुजती गुरु गोरक्षनाथ जी ने पढ़ कथ कर सुनाया श्री नाथजी गुरूजी को आदेश | आदेश |
ॐ शिव गोरक्ष योगी

शिव गुरु गोरक्षनाथ जी की संध्या आरती

ॐ गुरूजी शिव जय जय गोरक्ष देवा। श्री अवधू हर हर गोरक्ष देवा॥
सुर मुनि जन ध्यावत सुर नर मुनि जन सेवत ।
सिद्ध करे सब सेवा, श्री अवधू संत करे सब सेवा। शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ १॥

ॐ गुरूजी योग युगती कर जानत मानत ब्रह्म ज्ञानी ।
श्री अवधू मानत सर्व ज्ञानी।
सिद्ध शिरोमणि रजत संत शिरोमणि साजत।
गोरक्ष गुन ज्ञानी , श्री अवधू गोरक्ष सर्व ज्ञानी । शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ 2॥

ॐ गुरूजी ज्ञान ध्यान के धरी गुरु सब के हो हितकारी।
श्री अवधू सब के हो सुखकारी ।
गो इन्द्रियों के रक्षक सर्व इन्द्रियों के पालक।
रखत सुध साडी, श्री अवधू रखत सुध सारी। शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ 3॥

ॐ गुर्जी रमते श्रीराम सकल युग माहि चाय है नाही।
श्री अवधू माया है नाही ।
घाट घाट के गोरक्ष व्यापे सर्व घाट श्री नाथ जी विराजत।
सो लक्ष मन माहि श्री अवधू सो लक्ष दिल माहि॥ शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ ४॥

ॐ गुरूजी भस्मी गुरु लसत सर्जनी है अंगे।
श्री अवधू जननी है संगे ।
वेड उचारे सो जानत योग विचारे सो मानत ।
योगी गुरु बहुरंगा श्री अवधू बाले गोरक्ष सर्व संगा। शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ ५॥

ॐ गुरूजी कंठ विराजत सेली और शृंगी जत मत सुखी बेली ।
श्री अवधू जत सैट सुख बेली ।
भगवा कंथा सोहत- गेरुवा अंचल सोहत ज्ञान रतन थैली ।
श्री अवधू योग युगती झोली। शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ ६॥

ॐ गुरूजी कानो में कुंडल राजत साजत रवि चंद्रमा ।
श्री अवधू सोहत मस्तक चंद्रमा ।
बजट शृंगी नादा- गुरु बाजत अनहद नादा -गुरु भाजत दुःख द्वंदा।
श्री अवधू नाशत सर्व संशय । शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ ७॥

ॐ गुरु जी निद्रा मरो गुरु कल संहारो -संकट के हो बेरी।
श्री अवधू दुष्टन के हो बेरी।
करो कृपा संतान पर गुरु दया पालो भक्तन शरणागत तुम्हारी । शिव जय जय
गोरक्ष देवा॥ ८॥

ॐ गुरु जी इतनी श्रीनाथ जी की संध्या आरती।
निष् दिन जो गावे - श्री अवधू सर्व दिन रट गावे ।
वरनी राजा रामचंद्र स्वामी गुरु जपे राजा , रामचंद्र योगी ।
मनवांछित फल पावे श्री अवधू सुख संपत्ति फल पावे। शिव जय जय गोरक्ष देवा॥ ९॥

शिव गोरक्ष बावनी ॥

शिव गोरक्ष शुभनाम को रटते शेष महेश॥
सरस्वती पूजन करे वंदन करे गणेश॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रटे जो मन दिन रात॥
आवागमन को भेट के मनवांछित फल पात॥
शिव गोरक्ष शुभनाम से हुए है सिद्ध सुजन॥
नाम प्रभाव से मिट गया लोभ क्रोध अभिमान॥
शिव गोरक्ष शुभनाम से हो जाओ भावः पार॥
कलिकाल में है बड़ा सुंदर खेवन हार॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है जिसने लिया चित्तलय ॥
अश्त्ता सिद्धि नवनिधि मिली, अंत में अमर कहे ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम में शक्ति अपरम्पार ॥
लेत ही मिट जाट है अन्तर के अन्धकार ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है रटे जो निष् दिन जिव ॥
नश्वर यह तन छोड़ के जिव बनेगा शिव॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को मन तू रट ले अघाय
काहे को चंचल भया जैसे पशु हराय॥
शिव गोरक्ष शुभनाम में निष् दिन कर तू वास॥
अशुभ कर्म सब छूट है सत्य का होगा भास॥

शिव गोरक्ष शुभनाम में शक्ति भरी अगाध॥
लेने से ही तर गए नीच कोटि के व्याध ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को जो धरे अन्तर बिच॥
सबसे ऊँचा होत है भले होया वह नीच ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम में करे जो नर अति प्रेम ॥
उसको नही करना पड़े पूजा व्रत जप नेम ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रटे जो बारम्बार
सहजही में हो जायेंगे भावः सिन्धु से पार।
शिव गोरक्ष शुभनाम से सिख लेव अद्वैत।
मेरा तेरा छोड़ दो तजो सका ये द्वैत ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रत्ना आठो यम् ॥
आख़िर में यह आएगी मोदी तुमको कम
शिव गोरक्ष शुभनाम में शक्ति भरी अथाह॥
रटने वालो को मिला भावः सिन्धु का थाह॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को पहिचान जयदेव
यह दुस्सह संसार से तर गए वो तट खेव॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रसना रट तू हमेश॥
वृथा नही बकवाद कर पल पल काहे आदेश॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रतल तू चिट्टा लाया
घोर कलि से बचने का एक यही उपाय ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को मन तू रट दिन रात ॥
झूट प्रपंच को त्याग दे छोड़ जगत की बात॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रसना कर तू याद॥
काहे स्वार्थ में भूल के वृथा करत बद्कवाद॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को मन तू रट दिन रैन ॥
कभू न खली जन दे एक भी तेरा बैन॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को सुमिरे कोटि संत॥
श्री नाथ कृपा से हो गया जन्म मरण का अंत
शिव गोरक्ष शुभनाम है निर्मल पवन गंग
रटने से रहती है सदा सदा रिद्धि सिद्धि सब संग॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है जैसा पूनम चाँद ॥
रटते है निशदिन उन्हें राम कृष्ण गोविन्द ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है जैसा गंगा नीर ॥
रट के उतरे कोटि जन भावः सागर के तीर॥
शिव गोरक्ष शुभनाम में जो जन करते आस
निश्चय वो तो जाट है अलख पुरूष के पास ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है जैसे सुंदर आम ॥
रटने से ही हो गया अमर जगत में नाम ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम में जैसे दीप प्रकाश॥
नित रटने से होत है अलख पुरूष का भास ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है उदधि तरन को जहाज ॥
रटने से हो गया है अमर भरतरी राज ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है जैसे सूर्य किरण ॥
रतल जिव तू प्रेम से चाहे जो सिन्धु तरन ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है निर्मल और विशुधा ॥
रटने से शुदा होत है होया जो जिव अशुधा ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है अमर सुधा रस बिन्द॥
पिने से हो गए है अजर अमर गोपीचंद ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है रटे अनेको राज ॥
जरा मरण का भय मिटा सुधरे सबके काज॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रता है पूरण मल ॥
आधी व्याधि मिट गई जन्म मरण गया टल॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रटते चतुर सुजन
अन्तर तिमिर विनाश हो उपजत है शुध्हा ज्ञान ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है सुंदर उज्जवल भान ॥
रटने वालो को कभी होवे नही कुछ हान॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को परस पत्थर जान ॥
जिव रूपी इस लोह को करते स्वर्ण समान ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को जानो सुर तरु वर ॥
रटने से मिल जाट है जिव को इच्छित वर ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रटते कोटिक संत
नाम प्रताप से कट गया चौरासी का फंद ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम का बहुत बड़ा है पर्व ॥
जिसको है रटते सदा सुर नर मुनि गन्धर्व ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रटते श्री हनुमान
भक्तो में हुए अग्रगण्य देवो में मिला मान ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को रटे जो जिव अज्ञान
नाभि प्रताप से होत है निश्चय चतुर सुजान॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है जैसे निर्मल जल ॥
प्रेम लगा रटते रहो क्षण क्षण और पल ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है कलि तरन हार ॥
रटने वालो के लिए खुला है मोक्ष का द्वार॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है जैसा स्वच्छा आकाश ॥
रटने वालो को बना लेते है निज दास॥

शिव गोरक्ष शुभनाम है अग्ने अपो आप ॥
रटने वालो को सभी जल जाते है पाप ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम है अमर सुधारस बिन्दु ॥
पिने से तर जाट है सहज ही में भावः सिन्धु ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम की महिमा अपरम्पार ॥
कृपा सिन्धु की बिन्दु को कार्ड भावः से पार ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को बंदन करू हज़ार ॥
कृपा करो त्रिलोक पार करदो भावः से पार ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को प्रेम सहित आदेश ॥
ऐसी कृपा करो प्रभु रहे नही कुछ शेष ॥
शिव गोरक्ष शुभनाम को कोटि करू आदेश॥
करके कृपा मिटाइए जन्म मरण का क्लेश॥

ॐ शिव गोरक्ष अल्लख निरंजन आदेश ।
गोरक्ष बालम गुरु शिष्य पालं शेष हिमालम
शशि खंड भालं ॥
कालस्य कालं जित जन्म जालम वंदे जटालं जग्दाब्जा नालं ॥

सुने सुनावे प्रेमवश पूजे अपने हाथ ।
मन इच्छा सब कामना , पुरे गोरक्षनाथ

गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ
अल्लख ॥ ॥ ॥ ॥ ॥

श्रीबाला जाप बीजमंत्र

ॐ नमो आदेश गुरूजी कौं, आदेश ॐ गुरूजी -
ॐ सोहं ऐं क्लीं श्री सुन्दरी बाला
काहे हात पुस्तक काहे हात माला |
बायें हात पुस्तक दायें हात माला जपो तपो श्रीसुन्दरी बाला |
जिवपिण्डका तूं रखवाला हंस मंत्र कुलकुण्डली बाला |
बाला जपे सो बाला होय बूढा जपे सो बाला होय ||
घट पिण्डका रखवाला श्रीशंभु जति गुरु गोरख बाला |
उलटंत वाला पलटंत काया सिद्धोंका मारग साधकोंने पाया ||
ॐ गुरूजी, ॐ कौन जपंते सोहं कौन जपंते ऐं कौन जपंते |
क्लीं कौन जपंते श्रीसुन्दरी कौन जपंते बाला कौन जपंते ||
ॐ गुरूजी, ॐ जपंते भूचरनाथ अलख अगौचर अचिंत्यनाथ |
सोहं जपंते गुरु आदिनाथ ध्यान रूप पठन्ते पाठ ||
ऐ जपंते व्रह्माचार वेद रूप जग सरजन हार |
क्लीं जपंते विष्णु देवता तेज रूप राजासन तपता ||
श्रीसुन्दरी पारवती जपन्ती धरती रूप भण्डार भरन्ती |
बाला जपंते गोरख बाला ज्योति रूप घट घट रखवाला ||
जो वालेका जाने भेव आपहि करता आपहि देव |
एक मनो कर जपो जाप अन्तवेले नहि माई बाप ||
गुरु सँभालो आपो आप विगसे ज्ञान नसे सन्ताप |
जहां जोत तहाँ गुरुका ज्ञान गतगंगा मिल धरिये ध्यान ||
घट पिण्डका रखवाला श्रीशंभु जति गुरु गोरख बाला |
जहां बाला तहां धर्मशाला सोनेकी कूची रुपेका ताला ||
जिन सिर ऊपर सहंसर तपई घटका भया प्रकाश |
निगुरा जन सुगुरा भया कटे कोटि अघ राश ||
सुचेत सैन सत गुरु लखाया पडे न पिण्ड विनसे न काया |
सैन शब्द गुरु कन्हें सुनाया अचेत चेतन सचेत आया ||
ध्यान स्वरूप खोलिया ताला पिण्ड व्रह्माण्ड भया उजियाला |
गुरु मंत्र जाप संपूरण भया सुण पारवती माहदेव कह्ना ||
नाथ निरंजन नीराकार बीजमंत्र पाया तत सार |
गगन मण्डल में जय जय जपे कोटि देवता निज सिर तपे ||
त्रिकुटि महल में चमका होत एकोंकार नाथ की जोत |
दशवें द्वार भया प्रकाश बीजमंत्र, निरंजन जोगी के पास ||
ॐ सों सिद्धोंकी माया सत गुरु सैन अगम गति पाया |
बीज मंत्र की शीतल छाया भरे पिण्ड न विनसे काया ||
जो जन धरे बाला का ध्यान उसकी मुस्किल ह्नोय आसान |
ॐ सोहं एकोंकार जपो जाप भव जल उतरो पार ||
व्रह्मा विष्णु धरंते ध्यान बाला बीजमंत्र तत जान |
काशी क्षेत्र धर्म का धाम जहां फूक्या सत गुरने कान ||
ॐ बाला सोहं बाला किस पर बैठ किया प्रति पाला |
ऋद्ध ले आवै सुण्ढ सुण्ढाला हित ले आवै हनुमत बाला ||
जोग ले आवे गोरख बाला जत ले आवे लछमन बाला |
अगन ले आवे सूरज बाला अमृत ले आवे चन्द्रमा बाला ||
बाला वाले का धर ध्यान असंख जग की करणी जान |
मंगला माई जोत जगाई त्रिकुटि महल में सुरती पाई ||
शिव शक्ति मिल वैठे पास बाला सुन्दरी जोत प्रकाश |
शिव कैलास पर थापना थापी व्रह्मा विष्णु भरै जन साखी ||
बाला आया आपहि आप तिसवालेका माइ न बाप |
बाला जपो सुन्न महा सुन्न बाला जपो पुन्न महा पुन्न ||
बाला जपो जोग कर जुक्ति बाला जपो मोक्ष महा मुक्ति |
बाला बीज मंत्र अपार बाला अजपा एकोंकार ||
जो जन करे बाला की सेव ताकौं सूझे त्रिभुवन देव |
जो जन करे बाला की भ्राँत ताको चढे दैत्यके दाँत ||
भरम पडा सो भार उठावै जहाँ जावै तहाँ ठौर न पावै |
धूप दीप ले जोत जगाई तहाँ वैठी श्री त्रिपुरा माई ||
ऋद्ध सिद्ध ले चौक पुराया सुगुरा जन मिल दर्शन पाया |
सेवक जपै मुक्ति कर पावै बीज मंत्र गुरु ज्ञान सुहावै ||
ॐ सोहं सोधन काया गुरु मंत्र गुरु देव बताया |
सव सिद्धनके मुखसे आया सिद्ध वचन निरंजन ध्याया ||
ओवं कारमें सकल पसारा अक्षय जोगि जगतसे न्यारा |
श्री सत गुरु गुरुमंतर दीजै अपना जन अपना कर लीजै ||
जो गुरु लागा सन्मुख काना सो गुरु हरि हर व्रह्मा समाना |
गुरु हमारे हरके जागे अरज करूं सत गुरुके आगे ||
जोत पाट मैदान रचाया सतसे ल्याया धर्मसे विठाया |
कान फूक सर जीवत कीया सो जोगेसर जुग जुग जीया ||
जो जन करे बालाकी आसा सो पावै शिवपुरिका वास |
जपिये भजिये श्रीसुन्दरी बाला आवा गवन मिटे जंजाला ||
जो फल मांगूँ सो फल होय बाला बीज मंत्र है सोय |
गुरु मंत्र संपूरण माला रक्षा करै गुरु गोरख वाला ||
सेवक आया सरणमें धन्या चरणमें शीष |
बालक जान कर कीजिये दयादृष्टि आशीष ||
गुरु हमारे हरके जागे नीवँ नीवँ नावूँ माथ |
वलिहारी गुरुर आपणे जिन दीपक दीना हाथ |

गोरक्षपंचाक्षर जाप

गोरषनाथ लिंवस्वरूपं गउ गो प्रतिपालनं |
अगोचरं गहर गभीरं गकाराइ न्मो न्मो || १ ||
रहतंच निरालंबं अस्थंभं भवनं त्रियं |
राष राष श्रव भूतानं रकाराइ न्मो न्मो || २ ||
षकार इकयिस व्रह्मांडं षेचरं जगद गुरुं |
षेत्रपालं षडग वंसे षकाराइ न्मो न्मो || ३ ||
नाना सास समो दाइ नाना रूप प्रकासितं |
नाद विंद समो जोति नकाराइ न्मो न्मो || ४ ||
थापितं थल संसारं अलेषं अपारं अगोचरं |
थावरे जंगमे सचिवं थकाराइ न्मो न्मो || ५ ||
गकारं ग्यान संयुक्तं रकारं रूप लाछ्नं |
षकारं इकीस व्रह्मंडं नकारं नादि विंदए || ६ ||
थाकारं थानमानयो थिर थापन थर्पनं |
गोरषनाथ अक्षरं मंत्रं श्रवाधाराइ न्मो न्मो || ७ ||
ॐ गों गोराक्षनाथाय विद्महे शून्यपुत्राय धीमहि तन्नो
गोरक्ष निरंजनः प्रचोदयात् | आदेश आदेश शिवगोरक्ष ||
गोरक्षवालं गुरु शिष्यपालं शेषाहिमालं शशिखण्ड भालम |
कालस्यकालं जितजन्मजालं वन्दे जटालं जगदब्ज नालं ||

Wednesday, 12 March 2014

बस्ती न सुन्यं सुन्यं न बस्ती अगम अगोचर ऐसा। गगन सिषर मंहि बालक बोलै ताका नांव धरहुगे कैसा॥१॥                                                                                                                                             हसिबा षेलिवा रहिबा रंग। कांम क्रोध न करिबा संग। हसिबा षेलिबा गा‍इबा गीत। दिढ़ करि राषि आपनं चीत।७।                                                                                                                                               हसिबा षेलिवा धरिबा ध्यान। अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियांन। हसै षेलै न करै मन भंग। ते निहचल सदा नाथ के संग।८।                                                                                                                                               घन जोवन की करै न आस चित्त न राखै कांमनि पास। नादबिंद जाकै घटि जरै ताकी सेवा पारबती करै।१९।                                                                                                                                                  बालै जोबनि जे नर जती काल दुकालां ते नर सती । फुरतैं भोजन अलप अहारी नाथ कहै सो काया हमारी।२०।                                                                                                                                              पंथ बिन चलिबा अगनि बिन जलिबा अनिल तृषा जहटिया। ससंबेद श्रीगोरख कहिया बूझिल्यौ पंडित पढ़िया।२२।                                                                                                                                          गगन मँडल में ऊंधाकूबा तहां अंमृत का बासा। सगुरा हो‍इ सु भरि-भरि पीवै निगुरा जा‍इ पियासा॥२३॥                                                                                                                                         मरौ वे जोगी मरौ मरण है मीठा। तिस मरणीं मरौ जिस मरणीं गोरष मरि दीठा॥२६॥                                                                                                                                           हबकि न बोलिबा ठबकि न चालिबा धीरैं धारिबा पावं। गरब न करिबा सहजैं रहिबा भणत गोरष रावं॥२७॥                                                                                                                                               थोड़ा बोलै थोड़ षा‍इ तिस घटि पवनां रहै समा‍इ। गगन मंडल से अनहद बाजै प्यंड पड़ै तो सतगुर लाजै॥३२॥                                                                                                                                               देव कला ते संजम रहिबा भूत कला अहारं। मन पवना लै उनमनि धरिबां ते जोगी तत सारं॥३४॥                                                                                                                                              अति  अहार यंद्री बल करै नासै ग्यांन मैथुन चित धरै। व्यापै न्यंद्रा झंपै काल ताके हिरदै सदा जंजाल॥३६॥                                                                                                                                          घटि घटि गोरख बाही क्यारी। जो निपजै सो हो‍ई हमारी। घटि घटि गोरष कहै कहांणीं। काचै भांडै रहे न पांणी॥३७॥                                                                                                                                             घटि घटि गोरष फिरै निरुता। को घट जागे को घट सूता। घटि घटि गोरष घटि घटि मींन। आपा परचै गुर मुषि चींन्ह॥३८॥                                                                                                                                             मन मैं रहिणा भेद न कहिणां बोलिबा अंमृत बाणीं। आगिला अगनी हो‍इबा अवधू तौ आपण हो‍इबा पांणीं॥६३॥                                                                                                                                           गोरष कहै सुणहुरे अवधू जग मैं ऐसैं रहणां। आंषैं देषिबा कांनैं सुणिबा मुष थैं कछू न कहणां॥७२॥                                                                                                                                               अहार न्यंद्रा बैरी काल कैसे कर रखिबा गुरूका भंदार। अहारतोड़ो निंद्रा मोड़ौ सिव सकती लै करि जोड़ौ॥८४॥                                                                                                                                            जोगी सो जे मन जोगवै बिला‍इत राज भोगवै। कनक कांमनी त्यागें दो‍इ सो जोगेस्वर निरभै हो‍इ॥१०२॥                                                                                                                                         कहणि सुहेली रहणि दुहेली कहणि रहणि बिन थोथी। पढ्या गुंण्या सूबा बिला‍इ षाया पंडित के हाथि रह ग‍ई पोथी॥११९॥                                                                                                                                        कहणि सुहेली रहणि दुहेली बिन षांया गुड़ मींठा। खा‍इ हींग कपूर बषांणै गोरष कहै सब झूठा॥१२०॥                                                                                                                                            भरि भरि षा‍इ ढरि ढरि जा‍इ। जोग नहीं पूता बड़ी बला‍इ। संजम हो‍इ बा‍इ संग्रहौ। इस बिधि अकल षुरिस कौ गहौ॥१४५॥                                                                                                                                            षांये भी मरिये अणषांये भी मरिये। गोरष कहैं पूता संजमि ही तरिये। मघि निरंतर कीजै बास। निहचल मनुवा थिर हो‍ई सांस॥१४६॥                                                                                                                             पवन हीं जोग पवन हीं भोग। पवन हीं हरै छतीसौ रोग। या पवन को‍ई जांणै भेव। सो आपै करता आपैं देव॥१४७॥                                                                                                                                              ब्यंद ही जोग ब्यंद ही भोग। ब्यंद हीं हरै चौसठि रोग। या बिंद का को‍ई जांणै भेव। सो आपै करता आपैं देव॥१४८॥                                                                                                                                              साच का सबद सोना का रेख। निगुरां कौंचाणक सगुरा कौं उपदेस। गुर क मुंड्या गुंन मैं रहै। निगुरा भ्रमै औगुण गहै॥१४९॥                                                                                                                                               गुरु की बाचा षोजैं नाहीं अहंकारी अहंकार करै। षोजी जीवैं षोजि गुरू कौं अहंकारीं का प्यंड परै॥१५१॥                                                                                                                                             स्वामी काची वा‍ई काचा जिंद। काची काया काचा बिंद। क्यूं करि पाकै क्यूं करि सीझै। काची अगनी नीर न षीजै॥१५६॥                                                                                                                                              तौ देबी पाकी बा‍ई पाका जिंद। पाकी काया पाका बिंद। ब्रह्म अगनि अषंडित बलै। पाका अगनी नीर परजलै॥१५७॥                                                                                                                                           ऊरम धूरम ज्वाला जोति। सुरजि कला न छीपै छोति। कंचन कवल किरणि परसा‍इ। जल मल दुरगंध सर्ब सुषा‍इ॥१६९॥                                                                                                                                       रूसता रूठ गोला-रोगी। भोला भछिक भूषा भोगी। गोरष कहै सरबटा जोगी। यतनां मैं नहीं निपजै जोगी॥२१४॥                                                                                                                                      जिभ्या इन्द्री एकैं नाल। जो राषै सो बंचै काल। पंडित ग्यांनी न करसि गरब। जिभ्या जीती जिन जीत्या सरब॥२१९॥                                                                                                                                         जोगी सो जो राषैं जोग। जिभ्या यंद्री न करै भोग। अंजन छोड़ि निरंजन रहै। ताकू गोरष जोगी कहै॥२३०॥                                                                                                                                             सुंनि ज मा‍ई सुंनि ज बाप। सुंनि निरंजन आपै आप। सुंनि कै परचै भया सथीर। निहचल जोगी गहर गंभीर॥२३१॥                                                                                                                                           पढ़ि पढ़ि पढ़ि केता मुवा कथिकथिकथि कहा कीन्ह। बढ़ि बढ़ि बढ़ि बहु धट गया पारब्रह्म नहीं चीन्ह॥ २४८॥                                                                                                                                                    सबद हमारा खरतर खाण्डा रहणि हमारी साची । लेखै लिखी न कागद माडी सो पत्री हम बाची॥ शब्दि॥ २६४॥                                                                                                                                                    कथणी कथै सों सिष बोलिये वेद पढ़ै सो नाती। रहणी रहै सो गुरू हमारा हम रहता का साथी॥२७०॥                                                                                                                                          दरसण मा‍ई दरसण बाप। दरसण माहीं आपै आप। या दरसण का को‍ई जाणै भेव। सो आपै करता आपै देव॥२७२॥

॥ योगसारसंग्रहः॥

कुण्डलिनीस्वरूपमाह -
अथ योगसारसंग्रहे कुण्डलिनी स्वरूपक्रियानिरूपणं नाम
चतुर्दशोध्यायः
पिण्डाण्डान्तर चक्रमध्य सुषिराक्रान्ताब्ज तन्तूपमा
विद्युद्व्यक्तलतेव भाति तनुभृत् गर्भान्तरालैः सदा।
मूलाधारगता त्रिमूर्ति जननी सर्वापर ब्रह्मणः
शक्तिः कुण्डलिनी त्रिलोक जननी वान्तामृतास्वादिनी॥
कुण्डली सुफणी नागी चक्रीषप्ती सरस्वती।
ललनारसनाक्षेत्रा ललाटा शक्तिचालिनी॥
राजीभुजंगी शेषा च कुजाह्वा सर्पिणी फणी।
आधारशक्तिः कुटिला करलाप्राण वाहिनी॥
अष्टवक्रा षडाधारा व्यापिनी कलनाधरा॥
चिद्रूपा कुञ्चिका बाला दुर्विज्ञेया सुरासुरैः।
दिक्कालाद्यनवच्छिन्ना सर्ववेदार्थगा शुभा॥
परापराविभागेन परशक्तिरियं स्मृता।
योगिनां हृदयां भोजे नृत्यन्ती नृत्तलालसा॥
आधारसर्वभूतानां स्फुरन्ती विद्युदाकृतिः।
शंखावर्तक्रमाद्देवि सर्वमन्त्रमयी शुभा॥
सर्वतत्वमयी साक्षात् सूक्ष्मात् सूक्ष्ममयी विभुः।
त्रियामा जननी देवी शब्दब्रह्मस्वरूपिणी॥
चतुर्विंशत् सदर्णात्मा पञ्चाशद्वर्णरूपिणी।
गुणितासर्वगात्रेषु कुण्डली परदेवता॥
विश्वानना प्रबुद्धात्मा सूत्रे मणिमिमं जंगम्।
एकधा गुणिताशक्तिस्सर्वविश्वप्रवर्तका॥
सर्वमन्त्रप्रसूस्तच्छ्रीः सर्वतन्त्रस्वरूपिणी।
इच्छाज्ञानक्रियात्मास्य तेजोरूपा गुणात्मिका॥
पञ्चाशद्वारगुणिता पञ्चाशद्वर्णमालिका।
अग्नीषोमात्मिका शुद्धा सोमसूर्याग्नि रूपिणी॥
इति। कुण्डली नामानि।
अथ तत्संप्रवक्ष्यामि कुण्डल्युत्थापन क्रमम्।
दुर्लभं सर्वदुष्टानां साध्यानं स जपक्रमम्॥
वामकेश्वर महातन्त्रे -
भुजंगाकाररूपेण मूलाधारं समाश्रिता।
शक्तिः कुण्डलिनी प्रोक्ता विसतन्तु निभाशुभा॥
मूलकन्दं फणाग्रेण दष्ट्वा कमलवन्दवत्।
मुखेन पुच्छं संगृह्य ब्रह्मरंध्रसमन्विता॥
योगयाज्ञवल्क्ये -
द्वादशारयुतं चक्रं नाभिदेशे प्रतिष्ठितम्।
तस्योर्ध्वे कुण्डली स्थानं नाभेस्तिर्यगधोर्ध्वगम्॥
अष्टप्रकृतिरूपासा त्वष्टधा कुण्डली कृता।
यथावद्वायुसंचारं ज्वलनादीनि नित्यशः॥
परितः कन्दपार्श्वेषु निरुध्येनं सदा स्थिता।
मुखेनैव समावेष्ट्य ब्रह्मरन्ध्रमुखं तथा॥
योगकाले त्वपानेन प्रबोधं या जलाग्निना।
स्वनन्ती हृदयाकाशे नागरूपा महोज्ज्वला॥
वायुर्वायुसखे नैव ततो याति सुषुम्नया॥
प्रणवचिन्तामणौ -
तत्रानलं वायुसखेन सार्धं धिया समारोप्य निरोधयेत् ततः।
ध्यायन् सदा चक्रणमप्रबुद्धं नाभौ सदा कुण्डलिनं निविष्टम्॥
नालं समावेष्ट्यमुखेन मध्यामन्यांश्च भोगेन सिरास्तथैव।
स्वपुच्छमास्येन निगृह्य सम्यक् पदं च संयम्यमरुद्गणानाम्॥
प्रबुद्ध नागेन्द्रवदुच्छ्वसन्ती सदाप्रबुद्धा प्रभया ज्वलन्ती।
नाभौ सदा तिष्ठति कुण्डली सा तिर्यग़्मनुष्येषु तथेतरेषु॥
उत्पत्ति नाश स्थिति हेतु भूतमाधारपद्मासन रन्ध्रपूर्णम्।
योगेष्टसिद्धिप्रदमादिमूलं जानीहितं कुण्डलिनं निविष्टम्॥
वायुना विवृतवह्नि शिखाभिः कन्दमध्यगतनाडिषु संस्थात्।
कुण्डलीं दहति यत्स्वभिरूपं संस्मरन्नपरवस्तु न एव॥
सन्तप्त वायुना तत्र वह्निना च प्रतापिता।
प्रसार्य फणभृद्भोगी प्रबोधं याति सत्वरा॥
बोधंगते चक्रिणि नाभिमध्ये प्राणान् सुसंभूय कलेबरेस्मिन्।
चरन्ति सर्वे सह वह्नि नैव यथा पटेतन्तु गतिस्तथैव॥
जित्वैवं चक्रिणी स्थानं तथाध्यानपरायणः।
ततो नयेदपानन्तु नाभेरूर्ध्वमनुस्मरन्॥
योगसारमञ्जर्याम् -
वायुयदावायुसखेन सार्धं नाभिं त्वतिक्रम्यगतः शरीरम्।
रोगाश्च नश्यन्ति बलाभिवृद्धिः कान्तिस्तदानीं भवन्ति प्रबुद्धा॥
ब्रह्मरन्ध्रमुखं मन्त्रवायवः पावकेन सहयान्ति समूह्याः।
केन चित्विह वदामि तवाहं वीक्षितं हृदि च दीपशिवावत्॥
निरोधितः स्याद्धृदि तेन वायुनामध्ये तदा वायुसखेन सार्धम्।
सहस्रपद्मस्य मुखं प्रविश्य कुर्यात्पुनस्त्वूर्ध्वमुखं द्विजेन्द्रे॥
प्रबुद्ध हृदयाम्भोजे गौर्यस्मिन् ब्रह्मणः पुरे।
बालात् श्रेणिवद्व्योम्नि विरराजसमीरणः॥
आहुर्मध्ये सुषुम्नायाः संस्थितो हुतभुक्तदा।
स जलाम्बुदमालासु विद्युल्लेखे वराजते॥
निरुध्यनाडी द्वितयं सोमसूर्यात्मकं प्रिये।
संप्राप्यकुम्भकावस्थां स्थिरचेता दृढासनः॥
संरुध्य च मनः स्वान्ते मूलाधारधराधरे।
हृत्कोणपुरमध्यस्थ वाहिसूर्येन्दुमण्डले॥
सुषुप्तभुजगाकारं सर्वमन्त्रमयीं पराम्।
इलापिग़्गलयो ग्रन्थि भेदत्रयविभेदिनीम्॥
षडम्बुजदरीमार्ग कवाटोद्घाटनक्षमाम्।
शनैरुन्नीयतां मूलादाज्ञायां सन्निवेशयेत्।
ततो रसनया भित्वा शिव द्वारार्गलं महत्॥
ब्रह्मरंध्रे दृगाधाय स्थिरं कृत्वा मनो हृदि।
तत्रापि मण्डलं देवी शृंगाटं सुमहोज्ज्वलम्॥
त्रिकोणं तु विजानीयात् वह्निसूर्येन्दुगर्भकम्।
तत्रेन्दु मण्डले देवी परमात्मा सदाशिवः॥
यावन्नशक्त्या संयोगं प्राप्नोति परमेश्वरः।
तावद् भ्रमयते विश्वं यन्त्रारूढं तु मायया॥
शिवः -
मूलाधारात् समुद्यन्ती शक्तिः कुण्डलिनी परा।
स्वमन्त्रोच्चारणा देव सम्यगूर्ध्वमुखी तदा॥
षड्ढुंकार स्वरोद्भिन्न षडंभुजकवाटिका।
भित्वा ब्रह्मार्गलं दिव्यं स्वपते स्थानमेयुषी।
वह्न्यर्कमण्डलं भित्वा द्रवन्ति चन्द्रमण्डलम्॥
तदुद्भवामृता स्वादा परमानन्दनन्दिनी॥
कुलयोषित् कुलंत्यक्त्वा परंपुरुषमेयुषी।
निर्लक्ष्यं निर्गुणं चैव कुलरूपविवर्जितम्॥
तत्र स्वच्छन्दरूपा तु परिरभ्य स्वकंपतिम्।
विश्राम्य च चिरं कालं तद्भोगाह्लाद नन्दिता॥
परमावृष्टिभिर्नित्यं सिञ्चन्ती योगिनस्तनुम्।
यथा गतेनमार्गेण पुनरेति स्वकं पतिम्॥
अनेन देवि योगेन मासाद्योगीश्वरो भवेत्।
षण्मासादणिमादीनां सिद्धीनामधिपो भवेत्॥
वत्सरात् पिबते नित्यं समुद्रमपि लीलया।
अर्कानिल नलादीनां जलानां स्तम्भनं क्रमात्॥
करोति लीलया योगी रुद्रशक्ति प्रभावतः।
त्र्यब्दात्सर्वज्ञको भूत्वा वलीपलितवर्जितः॥
महाबलो वज्रकायो जीवेदा चन्द्रतारकम्।
शक्तिमन्त्रमहायोगः कथितस्तवसुव्रते॥
वाञ्छाकल्पद्रुमाः सत्यं सत्यं यत्खेचरी पदे॥
श्रीशिवः -
स्थिरमासनमासीनः सकलीकृतविग्रहः।
जितश्वासो जितमताः जितकर्मा जितेन्द्रियः॥
नियोज्यघटिका यन्त्रे रसनां निश्चलात्मिकाम्।
अधस्ताच्चिन्तयेच्चक्रमाक्रान्ताधारमण्डलम्॥
तत्र मध्ये समुद्दीप्तां मूलशक्तिं विभावयेत्।
प्राणान्निरुध्योर्ध्वमुखीन्नयेद् भित्वाषडंबुजम्॥
एकीभूता हि नादाख्य चक्रभेदक्षमेण च।
तटिद्वलयसंकाशां स्फुरत्किरणरूपिणीम्॥
चिद्रूपां च निरालम्बे शून्य तेजो मये परे।
ब्रह्मद्वारस्य गर्भान्ते विसर्गाख्ये विलीयते॥
ततो रसनयोद्भिद्य प्रविशेद् ब्रह्मणः पदम्।
तस्मिन् कुलामृतं दिव्यं पीत्वाभूयो विशेत्कुलम्॥
तेन प्राशितमात्रेण परां सिद्धिमवाप्नुयात्॥ इति।
अथातः संप्रवक्ष्यामि मुद्रांखेचरिसंज्ञिकाम्॥
यथा विज्ञातया मर्त्यो लोकेस्मिन्न जरामरः।
मृत्युव्याधिजराग्रस्तं दृष्ट्वा लोकमिमं प्रिये॥
बुद्धिं दृढतरं कृत्वा खेचरीं तु समभ्यसेत्॥
प्रकटेन मयाप्रोक्तंमिदानीं खेचरीं शृणु॥
यत्रास्ते च गुरुर्देव दिव्ययोगप्रसादकः।
तत्र गत्वा च तेनोक्तां विद्यां संगृह्य खेचरीम्।
न तया रहितो योगी खेचरी सिद्धि भाग्भवेत्॥
खेचर्य खेचरीं युञ्जन् खेचरी बीज पूर्वया।
खचराधिपतिर्भूत्वा खेचरीषु सदा चरेत्।
खेचरावसथो वह्निरग्निमण्डलभूषितम्॥
व्याख्यातं खेचरी बीजं तेन योगः प्रसिध्यति।
मस्तकाख्यं महाचण्ड शिखी वह्निखवज्रभृत्॥
पूर्वबीजयुताविद्या व्याख्याता ह्यतिदुर्लभा।
षडंगविद्यां वक्ष्यामि तथाषट्स्वरभिन्नया॥
कुर्याद्देवी यथा न्यायं सर्वविद्याप्ति हेतवे।
सोमेशा नवमं वर्णं प्रतिलोमेन चोच्चरेत्॥
तस्यात्रिंशकमाख्यातमक्षरं च स रूपकम्।
तस्मादप्यष्टकं वर्णं विलोमेनावलं प्रिये॥
ततस्तत्पञ्चमं देवि तदादिरविपञ्चमम्।
इन्दोर्ह्रीं बिन्दुसंभिन्नं कूटोयं परिकीर्तितः॥
गुरूपदेशलभ्यं च सर्वरोगप्रसिद्धिदम्।
एतस्य देवजा माया विरूपकरणाश्रया॥
स्वप्नेपि न भवेत् तस्य नित्यं द्वादश जप्यकः।
यड्मरुपञ्चलक्षाणि जपेदपि सुयन्त्रितः॥
तस्य श्रीखेचरी सिद्धिः स्वयमेव प्रवर्तते॥ इति।
आदिनाथः -
एवं यस्य प्रबुद्धा सा तस्य सिद्धिर्भवेद्ध्रुवम्।
सर्वशास्तार्थ वेत्तृत्वं सौभाग्यं परमन्ततः॥
काव्यं च सर्वभाषाभिस्सालग़्कारपदोज्ज्वलम्।
करोति लीलया योगी रुद्रशक्ति प्रबोधनात्॥
अनेनैव प्रकारेण सर्वमन्त्राः स्फुरन्ति हि।
रुद्रग्रन्थिं ततो भित्वा मणिपूरे समानयेत्।
मणिपूरे यदा विष्टा शान्ति श्रीपुष्टि तुष्टयः॥
आकर्षणं परक्षोभं भवन्त्येता हि सिद्धयः।
मणीपूरात् समानाय्य स्वाधिष्ठाने प्रवेशयेत्॥
योगंगते स्वात्मनि नाभिमध्ये प्राणान् सुंसंभूय कलेवरेस्मिन्।
स चरन्ति सर्वे सह वह्निनैव यथा पटे तन्तु गतिस्तथैव॥
योगग्रन्थिं च भित्वाथ मण्डलं च भिनत्यथ।
योगसारमञ्जर्याम् -
अनाहतं तु संलीनो योगग्रन्थिविभेदनात्॥
गिरीणां पातनं चैव देवि कुर्यान्मृत्योश्च वञ्छनम्॥
प्रणवचिन्तामणौ -
यदा विशुद्धमानीतं सामृतप्राशनं तदा।
योगिनः संप्रवर्तन्ते ह्यणिमाद्यष्टसिद्धयः॥
तदूर्ध्वे लम्बिकां भित्वानासाग्रं तु समानयेत्।
नासाग्रे श्वाससंभिन्न भ्रूमध्ये सन्निवेशयेत्॥
आज्ञास्थानगतो योगी सर्वं जानाति सर्वदा॥
योगसारमंजर्याम् -
श्वासेनसहितं जीवं तेजोरूपं ललाटके।
गत्वालक्ष्यं ललाटस्थं प्रविशेत् सूर्यसन्निभम्॥
कुञ्चिकाग्रं ततः सूक्ष्मं चिद्रूपाणि च सुस्थिरम्।
उद्घाटयेत् ततो द्वारं शिवद्वारार्गलं महत्॥
बिन्दुं द्विरर्गलं भित्वा दुर्भेद्यं त्रिदशैरपि।
ब्रह्माण्डोदरमित्युक्तं योगिनीसिद्धिसेवितम्॥
तदेतंगुलोत्सेधं कपाले संव्यवस्थितम्।
शक्तिचक्रप्रवेशेन सर्वसिद्धिर्भवेद्ध्रुवम्॥
आदिनाथः -
अपानवृत्तिमाकृष्य प्राणो गच्छतिमध्यमे।
राजते गगनां भोजे राजयोगस्तु तेन वै॥
एतत् साधनमार्गस्य लक्षणं वक्ष्यतेधुना।
प्राकाराणि शरीरस्य षडुत्तानत्वगादिभिः॥
षडब्जैष्षट्क वाटैस्तद्रक्षितं पञ्चवायुभिः।
तन्मध्ये सुषिरं सूक्ष्मं तत्र लिग़्गं शिवालयम्॥
तस्यशक्तिः स्थिताबाह्ये प्राकारद्वारमण्टपे।
तटिद्वलयसंकाशां सुप्तांपतिविलोलुपाम्॥
प्राकारपालकेनैव कवाटानां प्रभेदनम्।
कृत्वातां प्रापयेच्छम्भुं तत्क्षणाद्ब्रह्मवर्त्मना॥
पूरयेन्मारुतं दिव्यं सुषुम्ना पश्चिमे मुखे।
शनैः संबोधये च्छक्तिं कुण्डली मनुनैवताम्॥
पवनेनसमाकृष्य योजयेत् पतिना सह॥ इति।
शक्तिध्यानं विनायोगी शक्तिहीनः प्रजायते॥
शक्तिध्यानप्रयोगेण शक्तियुक्तो भवेद् ध्रुवम्॥
अथ मन्त्रोद्धारः -
कुण्डलीश प्लदं देवि कुण्डलीशसमन्वितम्।
कुण्डली कुण्डला बिन्दु नादमध्यस्थ लांछिताम्॥
एतच्छक्ति मयं बीजं रहस्यं सुप्रकाशितम्।
पञ्चलक्षं जपेदाशुसिद्धिर्भवति योगिनः॥
ओं कुण्डलीं कुण्डलीश कुण्डली कुण्डला ओं॥ इति॥
बिन्दुः प्रणवः। नादं दीर्घस्वरः। तदुक्तं नादबिन्दुपनिषदि
बीजाक्षरं परं बिन्दु नादं तस्योपरिस्थितम्॥ इति।
नारसिंहतापनीये -
वेदादि मूलं सकलं स्वराणां त्रयोदशस्थं शशिबिन्दुरूपम्।
वेदान्वितं सुप्तभुजंगरूपं यो वेत्ति विद्वान् स विमुक्तिमेति॥ इति।
योगिनीहृदये च -
या मूलाद्दूरगाशक्तिः स्वाधारे बिन्दुरूपिणी।
तस्यामुत्पद्यते नादः सूक्ष्मरूपो दिवाकरः॥
स्थूलसूक्ष्मभेदेन बिन्दुनाथास्त्री विधः।
तदुक्तं शिवयोगे -
स्थूलसूक्ष्मपरश्चेति त्रिविधो बिन्दुरद्रिजे।
स्थूलश्शुक्रात्मको बिन्दुः सूक्ष्मः पञ्चाग्नि रूपकः॥
सोमात्मकः परः प्रोक्तः स तु नित्यस्सदा शिवः॥
तदुक्तं शूलिनीकल्पे -
शुक्रं प्रवृत्तमिति। सूक्ष्मपञ्चाग्नि रूपकः। पञ्चमात्रः प्रणवः।
सोमात्मकः परः। षोडशमात्रायुक्तः प्रणवः॥
अनयारहितो योगी न क्वचित्फलमाप्नुयात्।
बीजेन हि विनावृक्षः कथं संजायते भुवि॥
तदेवाक्षरमध्यस्थं प्ररोहति कथं पुनः।
सर्वयोगद्रुमस्यायं बीज भूतो महामनुः॥
तदुक्तं कठवल्क्योपनिषदि -
सर्वे देवायत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमि त्येतत्॥
अतः। स्थूलसूक्ष्मभेदेन बिन्दुशब्दः प्रणवस्यैव॥
गोरक्षः। धूमोमरीचिः खद्योतः दीप ज्वालेन्दु भास्वरः।
अमीकला महाबिन्दो बिन्दुविश्वविभासकः॥ इति।
आदिनाथः -
एवं यस्य प्रबुद्धा सा तस्यसिद्धिः करस्थिता।
सर्वशास्त्रार्थ वेत्तृत्वं सौभाग्यं परमन्ततः॥
काव्यं च सर्वभाषाभिः सालंकार पदोज्ज्वलम्।
करोति लीलया योगी रुद्रशक्ति प्रबोधनात्॥
अनेनैव प्रकारेण सर्वमात्रान् स्फुरन्ति हि।
रुद्रग्रन्थिं ततो भित्वा विष्णुग्रन्थिंभिनत्यतः॥
ब्रह्मग्रन्थिं ततो भित्वा कमलानिभिनत्ति षट्।
सहस्रकमलेशक्तिश्शिवेन परिमोदते॥
मणिपूरे यदा विष्ठा शान्तिश्श्री तुष्टि पुष्टयः।
आकर्षणं परक्षोभो भवन्त्येव हि सिद्धयः॥
मणिपूरात्समानीय स्वाधिष्ठाने प्रवेशयेत्।
स्वाधिष्ठानात् समानीय चानाहत पदं नयेत्॥
योगसारमञ्जर्याम् -
अनाहते तु संलीने योगग्रन्थिविभेदनात्।
गिरीणां पातनं देवि कुर्यान्मृत्योश्च वञ्छनम्॥
यदा विशुद्धमानीतः सा मृतप्राशनं तदा।
योगिनः संप्रवर्तन्ते ह्यणिमाद्यष्टसिद्धयः॥
तदूर्ध्वं लाम्भिकां भित्वा नासाग्रं तु समानयेत्।
नासाग्रे श्वाससंभिन्नं भ्रूमध्ये संनिवेशयेत्॥
आज्ञास्थानगतो योगी सर्वं जानाति सर्वदा।
योगसारमंजर्याम् -
श्वासेन सहितं जीवं तेजोरूपं ललाटिके॥
गत्वालक्ष्यं ललाटस्थं प्रविशेत् सूर्यसन्निभम्।
कुञ्चिकाग्रं ततः सूक्ष्मं चिद्रूपाणि च सुस्थिरम्॥
उद्घाटयेत् ततो योगी द्वारं शिवद्वारार्गलं महत्।
बिन्दु द्विरर्गलं भित्वा दुर्भेद्यं त्रिदशैरपि॥
ब्रह्माण्डोदरमित्युक्तं योगिनी सिद्धि सेवितम्।
तदेतदंगुलोत्सेधं कपाले स व्यवस्थितम्॥
शक्तिचक्र प्रवेशेन सर्वसिद्धिर्भवेद्ध्रुवम्॥
आदिनाथः -
अपानवृत्तिमाकृष्य प्राणो गच्छति मध्यमे।
राजते गगनाम्भोजे राजयोगस्तु तेन वै।
एतत् साधनमार्गस्य लक्षणं वक्ष्यतेधुना॥
प्राकाराणि शरीरस्य षडुक्तानि त्वगादिभिः।
तन्मध्ये सुषिरं सूक्ष्मं तत्रलिग़्गं शिवालयम्॥
तस्य शक्ति स्थिता बाह्ये प्राकारद्वारमण्टपे।
तटिद्वलयसंकाशां सुप्तांपति विलोलुपाम्॥
प्राकारपालके नैव कवाटानां प्रभेदनम्।
हुंकारं च षडिति पूर्वमेवोक्तम्।
कृत्वातां प्रापयेच्छम्भुं तत्क्षणाद्ब्रह्मवर्त्मना॥
पूरयेन्मारुतं दिव्यं सुषुम्ना पश्चिमे मुखे।
शनैः संबोधयेच्छक्तिं कुण्डली मनुनैवताम्॥
पवनेन समाकृष्य योजयेत् पतिना सह॥ इति।
शक्तिध्यानं विनाशक्त्या हीनो योगी प्रजायते।
शक्ति ध्यानप्रयोगेण शक्तियुक्तो भवेद्ध्रुवम्॥ इति।
यदा तु योगिनो बुद्धिस्त्यक्तुं देहमिमं भवेत्।
तदा स्थिरासनो भूत्वा मूलाच्छक्तिं समुज्ज्वलाम्।
कोटि सूर्यप्रतीकाशां भावयेच्चिरमात्मवित्॥
आपादमस्तमस्तपर्यन्तं प्रसृतं जीवमात्मनः।
संहृत्य क्रमयोगेन मूलाधारात्पदं नयेत्॥
तत्र कुण्डलिनी शक्तिं संवर्तानिलसन्निभाम्।
जिह्वानलं चेन्द्रियाणि ग्रसन्तीं चिन्तयेद्धिया॥
संप्राप्य कुम्भकावस्थां तटिद्वलयभासुराम्।
मूलादुन्नीय देवेशि स्वाधिष्ठान पदं नयेत्।
तत्रस्थं जीवमखिलं ग्रसन्तं चिन्तयेच्चताम्॥
तटित्कोटिप्रतीकाशां तस्मादुन्नीयसत्वरम्।
मणिपूरपदं प्राप्य तत्र पूर्ववदाचरेत्॥
समुन्नीयपुनः स्थानात् अनाहतपदं नयेत्।
तत्रस्थित्वा क्षणं देवि पूर्ववद् ग्रथितं स्मरेत्॥
तत्रापि चिन्तयेद् देवि पूर्ववद् योगमात्मवित्।
तस्मादुन्नीयभ्रूमध्यं नीत्वा जीवं ग्रसन् स्मरेत्॥
परामृत महाम्भोधौ विश्रामं सम्यगाचरेत्।
तत्रस्थं परमं देवं शिवं परमकारणम्।
शक्त्या सहसमायोज्य तयोरैक्यं विभावयेत्॥
यदि वञ्चि तु मुद्युक्तः कालंकालविभागवित्।
यावद्वजति तं कालं तावत् तत्र सुखं वसेत्॥
ब्रह्मद्वारार्गलस्याधो देहे कालप्रयोजनम्।
यदा देव्यात्मकः कालमति क्रान्तः प्रविश्यति॥
तदा ब्रह्मार्गलं भित्वा शक्तिं मूलपदं नयेत्।
शक्ति देहान् प्रसूयन्ति स्वजीवं चेन्द्रियैः सह॥
तत्तत्कर्माणि संयोज्य स्वस्था देहे सुखं भवेत्।
अनेन देवि योगेन वञ्चयेत् कालमागतम्।
यदा मानुष्यकं देहं त्यक्तुमिच्छा प्रवर्तते॥
ततः परमसन्तुष्टः ब्रह्मस्थानगतं शिवम्।
शक्त्या संयोज्यनिर्भिद्य व्योमब्रह्मशिलं व्रजेत्॥
व्योमतत्वं महाव्योम्नि वायुतत्वमथानिले।
तेजस्तत्वं तथा तेजस्यप्तत्वं जलमण्डले॥
धरा तत्वं धराभागे निरालंबे मनः परे।
व्योमादि गुणतत्वेषु स्वेन्द्रियाणि निवेदयेत्॥
एवं सांसारिकं त्यक्त्वा परतत्वा वलं काः।
अदृष्टः परतत्वाद्यैर्भित्वा सूर्यस्यमण्डलम्॥
परतत्वे परेशानि शिवे लीनः शिवायते।
न कल्पकोटि साहस्रैः पुनरावर्तनं भवेत्॥
अनुग्रहायलोकानां यदि देहं न सन्त्यजेत्।
प्रलयान्ते तनुं त्यक्त्वा स्वात्मन्ये वाति वर्तते॥
इत्येषा खेचरीमुद्रा खेचराधिपतिर्भवेत्।
जन्ममृत्युजरारोगवलीपलितनाशिनी॥
अनया सदृशी विद्या क्वचिच्छास्त्रान्तरे न हि॥
खेचरी मेलनं देवि सुगुप्तं न प्रकाशयेत्॥ इति।
योगसारमञ्जर्याम् -
चुबुकं योजयेज्जिह्वां षोडशस्वरमण्डले।
भ्रूमध्ये चक्षुषी न्यस्य जिह्वामूर्ध्वं प्रसारयेत्॥
संप्राप्य कुम्भकावस्थामिडापिग़्गलरोधनात्।
मूलशक्तिं समाबोध्यभित्वाषट्सरसी रूहान्॥
तटित्सहस्रसग़्काशां ब्रह्माण्डोदर मध्यगाम्।
धमनि शिवामृताम्भोधौ सन्निवेश्य चिरं वसेत्॥
यथाब्रह्ममये धात्रि योगी वसति लीलया।
तथा तज्जीववद् देहं भाति स्फुरति तत्पदम्॥
अनेन देवि योगेन दिनसप्तकमाचरेत्।
यथा तथा स भवति जरामरणवर्जितः॥
मासमात्रप्रयोगेण जीवेदाचन्द्रतारकम्।
यदा ब्रह्मपुरं भित्वा योगी व्रजति लीलया॥
तदा शिवत्वमाप्नोति त्यक्त्वा देहमिमं प्रिये।
न पुनः पीयते मातुः स्तनं यद्भव हेतुकम्॥
इदं गुह्यतमं शास्त्रं सर्वेषां न प्रकाशयेत्।
अपरीक्षितवृत्तस्य स शीघ्रं नश्यति प्रिये॥
डम्भाहं कारहीनाय धार्मिकाय दृढाय च।
समक् शुश्रूषशीलाय दातव्यं मन्त्रपुष्पकम्॥
अविज्ञाय च यः कुर्यात् गुरुवाक्यामृतं विना।
भक्ष्यते सोथिराद्देवि योगिनीभिर्नसंशयः॥
य इदं परमं शास्त्रं ग्रन्थतश्चार्यतश्च हा।
गुरुवक्त्रात् तु लभ्येत स परां सिद्धिमाप्नुयात्॥
य इदं परमं गुह्यं खेचरी मेलनं वदेत्।
स एव हि गुरुर्देवि नान्योस्ति परमेश्वरि॥
बहुधा क्लिश्यमानाय भक्तायानन्य चेतसे।
एकान्ते विजने स्थाने प्रवक्तव्यं विपश्चिता॥
व्याख्यानकाले कर्तव्यः पूजाविधिरशाम्यतः।
भक्ष्यभोज्यादिभिर्युक्तं कस्तूरी चन्दनादिभिः।
पूजयेच्छास्त्रविधिना विद्यापुस्तकमादरात्॥
अथवा यद्यशक्तस्तु मानसेत घनामृतैः।
सन्तर्प्यपूज्यविधिना व्याख्यानं गुप्तमाचरेत्।
यस्य हस्ते स्थितं दिव्यं विद्यापुस्तकमीश्वरि॥
तस्य मूर्तिगतं देवि सकलज्ञानसागरम्।
यथार्थग्रन्थतश्चेदमर्थतश्च विदिष्यति॥
अशेषेण जगद्धात्रि स एव परमेश्वरः।
सर्वज्ञेन शिवेनोक्तमिदं जन्मार्बुदैरपि॥
दुलभं शास्त्रसारं तु विद्याज्ज्ञानप्रकाशकम्।
द्वावेव पुरुषौ लोके सिद्धः साधक एव च।
अभ्यासे नैव सततं यस्यमुत्परिवर्तते॥
अचिरान्मनसस्सिद्धिं स योगीसाधकः स्मृतः।
सम्यगभ्यस्य विज्ञाय यः समं मेलनं चरेत्॥
सर्वसाधारणत्वेन विकल्प कुटिलोज्झितः।
कर्ताभर्ता च संहर्ता नित्यतृप्तो निरामयः॥
पश्यत्यात्माविभेदेन जगदेतच्चराचरम्।
स योगी सर्वविच्छ्रीमान् सिद्ध इत्युच्यते बुधैः।
सहस्रारे महापद्मे स्थित्वा योगी विराजते॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन खेचरी मेलनं चरेत्॥ इति। अयं भावः -
द्वादशान्तादि मूलाधारान्तं विभाव्य पराशक्तिः स्वयं
कुण्डलिन्यादि रूपं भूत्वा सर्वाधारेषु सर्ववर्णेषु सूत्ररूपेण स्थिता।
तदुक्तं शारदातिलके -
शंखावर्तक्रमाद्देवी सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ इति।
दक्षिणामूर्ति कल्पे -
सूत्रेमणिमयं जगत्॥ इति।
सूत्ररूपेण मणिरूपेण स्थिता भवति। इति। अनन्त व्रतसूत्रग्रंथि रूपेण
सूत्ररूपेण यथा तथा कमलानि कलाश्च निर्मितवती।
तदुक्तं योगयाज्ञवल्क्ये -
अष्टप्रकृतिरूपा सा ह्यष्टधा कुण्डलाकृतिः॥ इति।
भगवद्गीतासु -
भूमिरापो नलो वायुः खं मनोबुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ इति।
अत एवाधाराद्यष्ट पद्मेषु अष्टवक्रेण स्थिता। पृथिव्यादयः पञ्चमनो
बुद्धिरहंकारा अष्टप्रकृतयः। भिन्नरूपत्वात् अष्टधाकुटिलीकृता।
द्वादशान्ते गुरुपादुका युग्मस्य पीठरूपे स्थित पद्मस्य नालरूपेण
कर्णिकारूपेण स्थितवती। एतदर्थं गुरुपादुका स्मरणा वसरे उच्यते।
सहस्रारे सूक्ष्मसृष्ट्यर्थं जगत्पावनार्थं बुद्धिरूपेणपत्यासह
स्थिता। तदुक्तं -
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसे॥ इति।
आज्ञाचक्रेण प्रज्ञायुक्तमनोरूपेण शंभुना सह स्थिता।
तदुक्तं -
तवाज्ञा चक्रस्थं तपन शशिकोटिद्युतिधरम्॥ इति।
विशुद्धे आज्ञाकाशरूपेण अमृतकुण्डलिरूपेण स्थिता।
तदुक्तं -
शशिकिरणसारूप्य सरणीति। अनाहते वायुरूपेण हृदयकमलस्य
नालरूपेण स्थिता। सर्वकारणरूपेण स्वाधिष्ठाने स्थिता।
स्वाधिष्ठानेदुग्धामृतवर्षेण जगत्प्लावनार्थं मणिपूरे स्थिता।
तदुक्तं याज्ञवल्क्ये -
द्वादशारयुतं चक्रं तेन देहः प्रतिष्ठितः।
चक्रेस्मिन् भ्रमते जीवः पुण्यः पापः प्रचोदितः॥
सा शक्ति पुण्यपाप रूपत्वात् स्थूलसृष्ट्यर्थं पत्यासह क्रीडयित्वा
मूलाधारे स्थिता।
तदुक्तं याज्ञवल्क्ये -
द्वादशारयुतं चक्रं तेन देहः प्रतिष्ठितः।
चक्रेस्मिन् भ्रमते जीवः पुण्यपापप्रचोदितः॥
सा शक्तिः पुण्यपापरूपत्वात् सर्वकारणम्। अमृतवर्षेण स्वाधिष्ठाने
दग्ध जगत्प्लावनार्थं मणिपूरे मेघरूपेण स्थिता। मणिपूराद्धृदये
उड्डीयवर्षन्ती। तदुक्तं तव श्यामं मेघं कमपि
मणिपूरेकशरणमिति। स्थूलसृष्ट्यर्थं पत्यासहक्रीडयित्वा मूलाधारे
स्थिता।
तदुक्तं तवाधारे मूले सह समय चेति॥ एवं प्रवृत्तिः कुण्डलिन्याः इति।
॥ इति योगसारसंग्रहे कुण्डलिनी स्वरूपक्रियानिरूपणं नाम
चतुर्दशोध्यायः॥

॥ विवेक मार्तण्ड॥

श्री गुरुं परमानन्दं वन्दे स्वानन्द विग्रहम्।
यस्य संनिध्य मात्रेण चिदानन्दायते तनुः॥१॥
अन्तर् निश्चलितात्म दीप कलिका स्वाधार बन्धादिभिः
यो योगी युग कल्प काल कलनात् त्वं जजेगीयते।
ज्ञानामोद महोदधिः समभवद् यत्रादिनाथः स्वयं
व्यक्ताव्यक्त गुणाधिकं तम् अनिशं श्री मीननाथं भजे॥२॥
नमस्कृत्य गुरुं भक्त्या गोरक्षो ज्ञानम् उत्तमम्।
अभीष्टं योगिनां ब्रूते परमानन्द कारकम्॥३॥
एतद् विमुक्ति सोपानम् एतत् कालस्य वञ्चनम्।
यद् व्यावृत्तं मनो भोगादासक्तं परमात्मनि॥४॥
द्विजसेवितशाखस्य श्रुतिकल्पतरोः फलम्।
शमनं भव तापस्य योगं भजति सत्तमाः॥५॥
आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा।
ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट्॥६॥
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं क्षमा धृतिः।
दयार्जवं मिताहारः शौचं चैव यमा दश॥ ७॥
तपः सन्तोषास्तिक्यं दानमीश्वरपूजनम्।
सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीमती च जपो हुतम् ॥ ८॥
नियम अथ वक्ष्यामि योगमष्टाङ्गसंयुतम्।
सयोगं योगमित्याहुर्जीवात्मपरमात्मनोः॥ ९॥
आसनानि तु तावन्ति यावत्यो जीवजातयः।
एतेषामखिलान् भेदान् विजानाति महेश्वरः॥१०॥
चतुराशीति लक्षाणां एकम् एकम् उदाहृतम्।
ततः शिवेन पीठानां षोडेशानं शतं कृतम्॥११॥
आसनेभ्यः समस्तेभ्यो द्वयम् एव प्रशस्यते।
एकं सिद्धासनं प्रोक्तं द्वितीयं कमलासनम्॥१२॥
योनि स्थानकम् अङ्घ्रि मूल घटितं कृत्वा दृढं विन्यसेन्
मेढ्रे पादम् अथैकम् एव नियतं कृत्वा समं विग्रहम्।
स्थाणुः संयमितेन्द्रियोचल दृशा पश्यन् भ्रुवोर् अन्तरम्
एतन् मोक्ष कवाट भेद जनकं सिद्धासनं प्रोच्यते॥१३॥
वामोरूपरि दक्षिणं हि चरणं संस्थाप्य वामं तथा
दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढम्।
अङ्गुष्ठौ हृदये निधाय चिबुकं नासाग्रम् आलोकयेद्
एतद् व्याधि विकार हारि यमिनां पद्मासनं प्रोच्यते॥१४॥
आधारः प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम्।
तृतीयम् मणिपूराक्यं चतुर्थं स्यदनाहतम्॥१५॥
पञ्चमं तु विशुद्धाख्यमाज्ञाचक्रं तु षष्ठकम्।
सप्तमं तु महाचक्रं ब्रह्मरन्ध्रे महापथे॥१६॥
चतुर्दलं स्यादाधारः स्वाधिष्ठानं च षड्दलम्।
नाभौ दशदलं पद्मं सूर्यसङ्ख्यदलं हृदि॥ १७॥
कण्ठे स्यात् षोडशदलं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा।
सहस्रदलमाख्यातं ब्रह्मरन्ध्रे महापथे॥ १८॥
आधारः प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम्।
योनिस्थानं तयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते॥१९॥
आधाराख्यं गुदस्थाने पङ्कजं च चतुर्दलम्।
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता॥२०॥
योनि मध्ये महा लिङ्गं पश्चिमाभिमुखं स्थितम्।
मस्तके मणिवद् बिम्बं यो जानाति स योगवित्॥२१॥
तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत्।
त्रिकोणं तत्पुरंवह्नेरधो मेढ्रात्प्रतिष्ठितम्॥२२॥
यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्तं विश्वतो मुखम्।
तस्मिन् दृष्टे महा योगे यातायातं न विद्यते॥२३॥
दृष्टिः स्थिरा यस्य विनापि दृश्या
द्वायुः स्थिरो यस्य विनापि यत्नात्।
मनः स्थिरं यस्य विनाबलम्बवात्
स एव योगी स गुरूः स सेव्यः॥ २४॥
स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयः।
स्वाधिष्ठानाश्रयस्तस्मान्मेढ्रमेवाभिधीयते॥२५॥
तन्तुना मणिवत्प्रोतो यत्र कन्दः सुषुम्णया।
तन्नाभिमण्डले चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम्॥२६॥
द्वादशारे महाचक्रे पुण्यपापविवर्जिते।
तावज्जीवो भ्रमत्येव यावत्तत्त्वं न विन्दति॥२७॥
ऊर्ध्वं मेढ्रादधो नाभेः कन्दयोनिः खगाण्डवत्।
तत्र नाड्यः समुत्पन्नाः सहस्राणि द्विसप्ततिः॥२८॥
तेषु नाडि सहस्रेषु द्विसप्ततिरुदाहृताः।
प्रधानः प्राणवाहिन्यो भूयस्तासु दशस्मृताः॥२९॥
इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्णा च तृतीयका।
गान्धारी हस्ति जिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी॥३०॥
अलम्बुषा कुहूश्चैवशङ्खिनी दशमी स्मृता।
एतन्नाडिमयं चक्रं ज्ञातव्यं योगिभिः सदा॥३१॥
इडा वामे स्थिता भागे  दक्षिणे पिङ्गला स्मृता।
सुषुम्णा मध्यदेशे तु गान्धारी वामचक्षुषि॥३२॥
दक्षिणे हस्तिजिह्वा च पूषा कर्णे च दक्षिणे।
यशस्विनी वाम कर्णं आनने चाप्यलम्बुषा॥३३॥
कुहूश्च लिङ्ग देशे तु मूलस्थाने च शङ्खिनी।
एवं द्वारम् समश्रित्य तिष्ठन्ति दशनाडयः॥३४॥
इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्णा प्राणसंश्रिताः।
सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः॥३५॥
प्राणोपानः समानश्चोदानो तथैव च।
नागः कूर्मोथ कृकरो देवदत्तो धनञ्जयः॥३६॥
प्राणाद्याः पञ्चविख्याता नागाद्याः पञ्च वायवः।
हृदि प्राणो वसेन्नित्यमपानो गुदमण्डले॥३७॥
समानो नाभिदेशे स्यादुदानः कण्ठदेशगः।
व्यानो व्यापी शरीरे तु प्रधानाः पञ्चवायवः॥३८॥
उद्गारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने स्मृतः।
कृकरः क्षुतके ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भणे॥३९॥
न जहाति मृतं चापि सर्वव्यापि धनञ्जयः।
एते नाडीषुसहस्रेषु वर्तन्ते जीवरूपिणः॥४०॥
आक्षिप्तो भुज दण्डेन यथोच्चलति कन्दुकः।
प्राणापानसमाक्षिप्तस्तथा जीवो न तिष्ठति॥४१॥
प्राणापानवशो जीवो ह्यश्चोर्ध्वं च धावति।
वामदक्षिणमार्गेण चञ्चलत्वान्न दृश्यते॥४२॥
रज्जुबद्धो यथा श्येनो गतोऽप्याकृष्यते पुनः।
गुणबद्धस्तथा जीवः प्राणापानेन कृष्यते॥४३॥
अपानः कर्षति प्राणः प्राणोपानं च कर्षति।
ऊर्ध्वाधः संस्थिताव् एतौ संयोजयति योगवित्॥४४॥
हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत् पुनः।
हंसहंसेत्य्ं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा॥४५॥
षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येक विंशतिः।
एतत्सङ्ख्यान्वितं मन्त्र जीवो जपति सर्वदा॥४६॥
अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्ष दायिनी।
अस्याः सङ्कल्प मात्रेण नरः पापैर्विमुच्यते॥४७॥
अनया सदृशो विद्या अनया सदृशो जपः।
अनया सदृशं ज्ञानं न भूतं न भविष्यति॥४८॥
अनया सदृशं तीर्थमनया सदृशः क्रतुः।
अनया सदृशं पुण्यं न भूतं न भविष्यति॥४९॥
अनया सदृशो स्वर्गो अनया सदृशो तपः।
अनया सदृशं वेद्यम् न भूतं न भविष्यति॥५०॥
कुन्दलिन्याः समुद्भूता गायत्री प्राणधारिणी।
प्राणविद्या महाविद्या यस्तां वेत्ति स योगवित्॥५१॥
प्रस्फुरद् भुजगाकारा पद्मतन्तुनिभा शुभा।
मूढ़ानां बन्धिनि सास्ति योगिनां मोक्षदायिनो॥ ५२॥
कन्दोर्ध्वं कुण्डली शक्तिरष्टधा कुटिलाकृति।
ब्रह्मद्वारमुखं नित्यं मुखेनाच्छाद्य तिष्ठति॥५३॥
येन मार्गेण गन्तव्यं ब्रह्मस्थानमनामयम्।
मुखेनाच्छाद्य तद्द्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी॥५४॥
प्रबुद्धा वह्नियोगेन मनसा मारुतै सहः।
सूचीव गुणमादाय व्रजत्यूर्ध्वं सुषुम्णया॥५५॥
उद्घटयेत् कपातं तु यथा कुञ्चिकया हठात्।
कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वारं प्रभेदयेत्॥५६॥
कृत्वा सम्पुटितौ करौ दृढतरं बद्ध्वा तु पद्मासनं
गाढं वक्षसि सन्निधाय चिबुकं ध्यात्वा च  तच्चेतसा।
वारं वारमपानमूर्ध्वमनिलंप्रोच्चारयेत् पूरयन्
मुञ्चन् प्राणमुपैतिबोधमतुलं शक्तिप्रबोधान्नरः॥५७॥
अङ्गानां मर्दनं कृत्वा श्रमसञ्जातवारिणा।
कट्वम्ललवणत्यागीक्षीरभोजनमादिशेत्॥५८॥
ब्रह्मचारी मिताहारी त्यागी योगपरायणः।
अब्दादूर्ध्वं भवेत्सिद्धो नात्र कार्या विचारणा॥५९॥
सुस्निग्धमधुराहारं चतुर्थांशविवर्जितम्।
भुङ्क्त् य इश्वरप्रीत्यै मिताहारि स उच्यते॥६०॥
महामुद्रां नभोमुद्रामुड्डियानं जलन्धरम्।
मूलबन्धं च यो वेत्ति स योगी सिद्धिभाजनम्॥६१॥
अपानप्राणयोरैक्ये क्षयोमूत्रपुरीषयोः।
युवा भवति वृद्धोऽपि सततं मूलबन्धनात्॥ ६२॥
पार्ष्णिभागेनसंपीड्य योनिमाकुञ्चयेद् गुदम्।
अपानमूर्ध्वमाकृष्य मूलबन्धो निगद्यते॥ ६३॥
उड्डीनं कुरुते यस्मादविश्रान्तो महाखगः।
उड्डीयानं तदेव स्यान्मृत्युमातङ्गकेसरी॥ ६४॥
उदरात्पश्चिमे भागे ह्यधो नाभेर्निगद्यते।
उड्डीयानाह्वयो बन्धस्तत्र बन्धो विधीयते॥ ६५॥
बध्नाति हि सिरोजालं नाधो याति नभोजलम्।
ततो जालन्धरो बन्धः कण्ठे दुःखौघनाशकः॥ ६६॥
जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठसंकोचलक्षणे।
पीयूषं न पतत्यग्नौ न च वायुः प्रकुप्यति॥ ६७॥
कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा।
भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर् मुद्रा भवति खेचरी॥ ६८॥
चित्तं चलति खे यस्माज्जिह्वा चरति खे गता।
तेनैव खेचरी मुद्रा सर्वसिद्धैर्नमस्कृता॥ ६९॥
न रोगो मरणं तस्य न निद्रा न क्षुधा तृषा।
न च मूर्च्छा भवेत्तस्य यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम्॥ ७०॥
पीड्यते न च शिकेन लिप्यते न च कर्मणा।
बाध्यते न स केनापि यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम्॥ ७१॥
बिन्दुमूल शरीरणां शिरास्तत्र प्रतिष्ठिताः।
भावयन्ति शरीराणि चापादतलमस्तकम्॥ ७२॥
खेचर्या मुद्रितं येन विवरं लम्बिकोर्ध्वतः।
न तस्य क्षरते बिन्दुः कामिन्यालिङ्गितस्य च॥ ७३॥
यावद् बिन्दुः स्थितो देहे तावन्मृतोर्भयं कुतः।
यावद् बद्धा नभोमुद्रा तावद् बिन्दुर्न गच्छति॥ ७४॥
चलितोऽपि यदा बिन्दुः सम्प्राप्तश् च हुताशनम्।
व्रजत्यूर्ध्वं हृतः शक्त्या निरुद्धो योनिमुद्रया॥ ७५॥
स पुनर्द्विविधो बिन्दुः पण्डुरो लोहितस्तथा।
पाण्डुरः शुक्रमित्याहुर्लोहितां च महाराजः॥ ७६॥
सिन्दूरद्रवसङ्काशं राविस्थाने स्थितं रजः।
शशिस्थाने स्थितो बिन्दुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम्॥ ७७॥
बिन्दुः शिवो रजः शक्तिर्बिन्दुरिन्दू रजो रविः।
उभयोः सङ्गमादेव प्राप्यते परमं पदम्॥ ७८॥
वायुना शक्तिचारेण प्रेरितं तु यदा रजः।
याति बिन्दोः सहैकत्वं भवेद्दिव्यं वपुस्तदा॥ ७९॥
शुक्रं चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्येण संगतम्।
तयोः समरसैकत्वं यो जानाति स योगवित्॥ ८०॥
शोधनं नाडिजालस्य चालनं चन्द्रसूर्ययोः।
रसानाशोषणं कुर्यान्महामुद्राभिधीयते॥ ८१॥
वक्षोन्यस्तहनुः प्रोपिड्यसुचिरं योनिं च वमाङ्घ्रणा
हस्ताभामनुधारयेत्प्रसरितं पादं तथ दक्षिणम्।
आपूर्य श्वसनेन कुक्षियुगलं बध्वा शनैः रेचये
देषा व्याधिविनाशिनी च महतो मुद्रा नृणां प्रोच्यते॥ ८२॥
चन्द्राङ्गेन समभ्यस्य सूर्याङ्गेनाभ्यसेत्पुनः।
यावत्तुल्या भवेत्संख्या ततो मुद्रां विसर्जयेत्॥ ८३॥
न हि पथ्यमपथयं वा रसाः सर्वेऽपि नीरसाः।
अपि भुक्तं विषं घोरं पियूषमिवजिर्यति॥ ८४॥
क्षयकुष्ठगुदावर्तगुल्माजीर्णप्रिगमाः।
तस्य रोगाः क्षयं यान्ति महामुद्रांतु योऽभ्यसेत्॥ ८५॥
कथितेयं महामुद्रा महासिद्धिकरी नृणाम्।
गोप्नीया प्रयत्नेन न देया यस्य कस्य्चित्॥ ८६॥
पद्मासनं समारुह्य समकायशिरोधरः।
नासाग्रदृष्टिरेकान्ते जपेदोङ्कारमव्ययम्॥ ८७॥
भूर्भुवः स्वरिमे लोकाः सोमसूर्याग्निदेवताः।
प्रतिष्ठिता यत्र सदा तत्परं ज्योतिरोमिति॥ ८८॥
त्रयः कालास्त्रयो वेदास्त्रयो लोकास्त्रयः स्वराः।
त्रयो देवाः स्थिता यत्र तत्परं ज्योतिरोमिति॥ ८९॥
सत्त्वं रजस्तमश्चाव ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।
त्रयो देवाः स्थिता यत्र तत्परं ज्योतिरोमिति॥ ९०॥
कृतिरिच्छा तथा ज्ञानां ब्राह्मी रौद्री च वैष्णवी।
त्रिधा शक्तिः स्थिता यत्र तत्परं ज्योतिरोमिति॥ ९१॥
शुचिर्वाप्यशुचिर्वापि यो जपेत् प्रणवं सदा।
 न स लिप्यति पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ ९२॥
चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चल भवेत्।
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्॥ ९३॥
यावद् बद्धो मरुद्देहे तावच्चित्तं निरामयम्।
यावद् दृष्टिर्भ्रुवोर्मध्ये तावन्मृत्युभयं कुतः॥ ९४॥
यावद् वायुः स्थितो देहे तावज्जीवो न मुच्यते।
मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरोधयेत्॥ ९५॥
अतः कालभयाद् ब्रह्मा प्राणायामपरायणः।
योगिनो मुनयः सर्वें ततो वायुं निरोधयेत्॥ ९६॥
शुद्धिमेति यदा सर्वं नाडीचक्रं मलाकुलम्।
तदैव जायते योगी क्षमः प्राणनियन्त्रणे ॥ ९७॥
बद्धपद्मासनो योगी प्राणं चन्द्रेण पूरयेत्।
धारयित्वा यथाशक्ति पुनः सूर्येण रेचयेत्॥ ९८॥
अमृतंदधिसङ्काशं गोक्षीरधवलोपमम्।
ध्यात्वा चन्द्रमसो बिम्बं प्राणायामी सुखी भवेत्॥ ९९॥
प्राणं सूर्येण चाकृष्य पुरयेदुदरं शनैः।
कुम्भयित्वा विधानेन पुनश्चन्द्रेण रेचयेत्॥ १००॥
प्रज्वलज्ज्वलनज्वालापुञ्जमादित्यमण्डलम्।
ध्यात्वा नाभिस्थितं योगी प्राणायामे सुखी भवेत्॥ १०१॥
प्राणंश्चेदिडयापिबेत्परिमितं भूयोऽन्यया रेचयेत्
पीत्वा पिङ्गलया समीरणमथो बद्ध्वा त्यजेद् वामया।
सूर्यचन्द्रमसोरनेन विधिना बिम्बद्वयं ध्यायतां
शुद्धा नाडिगणा भवन्ति यमिनां मासत्रयादूर्ध्वतः॥ १०२॥
यथेष्टं धारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम्।
नादाभिव्यक्तिरारोग्यं जायते नाडिशोधने॥ १०३॥
प्राणो देहे स्थितो वायुरपानस्य निरोधनात्।
एकश्वसनमात्रेणोद्घाटयेत् गगने गतिम्॥ १०४॥
पूरकः  कुम्भकश्चैव रेचकः प्रणवात्मकः।
प्राणायामो भवेत् त्रेधा मत्रद्वादशसंयुतः॥ १०५॥
मात्राद्वादशसंयुक्तौ दिवाकरनिशाकरौ।
दोषजालमपध्नन्तौ ज्ञातव्यौ योगिभिः सदा॥ १०६॥
पूरके द्वादश प्रोक्ताः कुम्भके षोडशैव तु।
रेचके दश चोम्कराः प्राणायामः स उच्यते॥ १०७॥
अधमे द्वादश प्रोक्ता मध्यमे द्विगुणा मता।
उत्तमे त्रिगुणा ख्याताः प्राणायामस्य निर्णयः॥ १०८॥
अधमे च धनो धर्मः कम्पो भवति मधयमे।
उत्तमे स्थानमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्॥ १०९॥
बद्धपद्नासनो योगी नमस्कृत्य गुरुं शिवम्।
भ्रूमध्ये दृष्टिरेकाकी प्राणायामं समभ्य्सेत्॥ ११०॥
ऊर्ध्वमाकृष्य चापानवायुं प्राणे नियुज्य च।
उर्ध्वमानीय तं शक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ १११॥
द्वाराणां नवकं निरुद्ध्य मरुत पीत्वा दृढं धारयेत्
नीत्वाकाशमपानवह्निसहितं शक्त्या समुद्धटितम्।
आत्मस्थानयुतस्त्वनेन विधिना विन्यस्य मूर्घ्न ध्रुवं
यावत्तिष्ठति तावदेन महतां संघेन संस्तूयते॥ ११२॥
प्राणायामो भवत्येवं पातकेन्धनपावकः।
भवोदधिमहासेतुः प्रोच्यते योगिभिः सदा॥ ११३॥
प्राणायामे महान् धर्मों योगिनो मोक्षदयकः।
प्राणायामे दिवारात्रौ दोषजालं परित्यजेत्॥ ११४॥
आसनेन रुजो हन्ति प्राणायामेन पातकम्।
विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण मुण्चति॥ ११५॥
मनोधैर्यं धारणया ध्यानाच्चैतन्यमद्भुतम्।
समाधौ मोक्षमानोति त्यक्त्व कर्म शुभाशुभम्॥ ११६॥
प्राणायामद्विषटकेन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः।
प्रत्याहारद्विषट्केन ज्ञायते धारणा शुभा॥ ११७॥
धारणा द्वादश प्रोक्तां ध्यानं धानविशारदैः।
ध्यानद्वादशकेनैव समाधिरभिधीयते॥ ११८॥
सम्बद्धासनमेढ्रमंध्रियुगलं कर्णाक्षिनासापुटा
द्वाराण्यगुलिभिर्नियम्य पवनं वक्त्रेण चापूरितम्।
ध्यात्वा वक्षसि तत्त्वपानसहितं मूर्ध्नि स्थितं धारये
देवं याति नरः शिवेन समतां योगीश्वरस्तन्मयः॥ ११९॥
पवने गगनं प्राप्ते ध्वनिरुत्पद्यते महान्।
घण्टादीनां प्रवाद्यानां तदा सिद्धिरदूरतः॥१२०॥
प्राणायामेन युक्तेन सर्वरोक्षयो भवेत्।
आयुक्ताभ्यासयोगेन सर्वरोगस्य संभवह्॥ १२१ ॥
हिक्का श्वासश्च कासक्ष शिरः कर्णाक्षिवेदनाः।
भवन्ति विविधा रोगाः पवनस्य व्यतिक्रमात्॥ १२२॥
यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद् वश्यः शनैः शनैः।
तथैव सेवितो वायुरन्यथा हन्ति साधकम्॥ १२३॥
युक्तं युक्तं त्यजेद् वायुं युक्तं युक्तं च पूरयेत्।
युक्तं युक्तं च बनीयादेवं सिद्धिमाप्नुयात्॥ १२४॥
चरतां चक्षुरादीनां विषयेषु यथाक्रमम्।
यत्प्रत्याहरणं तेषां प्रत्याहारः स उच्यते॥ १२५॥
यथा तृतीयकालस्थो रविः प्रत्याहरेत् प्रभाम्।
तृतौयाङ्गस्थितो योगी विकारं मानसं तथा॥ १२६॥
अङ्गमध्ये यथाङ्गन् कूर्मः संकोचयेद् ध्रुवम्।
योगी प्रत्याहरेदेवमिन्द्रियाणि तथात्मनि॥ १२७॥
अमेध्यमथवा मेध्यं यं यं पश्यति चक्षुषा।
तत्तमात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित॥ १२८॥
यद्यच्छृणोति कर्णभ्यामप्रियं चाथवाप्रियम्।
तत्तदात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित्॥ १२९॥
अमिष्टमथवा मिष्टं यद्यत्स्पृशति जिह्वया।
तत्तदात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित्॥ १३०॥
सुगन्धमयं दुर्गन्धं यद्यज्जिध्रति नासया।
तत्तदात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित्॥ १३१॥
कर्कंशं कोमलं वापि यद्यत् स्पृशति च त्वचा।
तत्तदात्मेति विज्ञाय प्रत्याहरति योगवित्॥ १३२॥
चन्द्रामृत्मयीं धारां प्रत्याहरति भास्करः।
यत्प्रत्यहरणं तस्याः प्रत्याहारः स उच्यते॥ १३३॥
एका स्त्री भुज्यते द्वाभ्यामागता चन्द्रमण्डलात्।
तृतीयोऽपि पुनस्ताभ्यां स भवेदजरामरः॥ १३४॥
नाभिदेशे वसत्येको भास्करो दहनात्मनः।
अमृतात्मा स्थितो नित्यं तालुमूले च चन्द्रमाः॥ १३५॥
वर्षत्यधोमुखश्चन्द्रो ग्रस्त्यूर्ध्वमुखो रविः।
ज्ञातव्या करणं तत्र येन पीयूषमाप्यते॥ १३६॥
ऊर्ध्वं नाभिरधस्तालु चोर्ध्वं भानुरधः शशी।
करणं विपरीताख्यं गुरुवाक्येन लभ्यते॥ १३७॥
त्रिधा बद्धो वृषो यत्र रोखिति महास्वनः।
अनाहतं तु तच्चक्रं योगिनो हृदयेविदुः॥ १३८॥
अनाहतमतिक्रम्य चाक्रम्य मणिपूरकम्।
प्राप्ते प्राणे महापद्मं योगीतमृतायते॥ १३९॥
ऊर्धवं षोडशपत्रपद्मगलितं प्राणाद्वाप्तं हठा
दूर्ध्वस्यो रसनां नियम्य विवरे शान्ति परां चिन्तयन्।
उत्कल्लोलकलाजलं सुविमलं जिह्वाकुलम् यः पिबे
न्निर्दोषः स मृणालकोपुर्योगी चिरं जीवति॥ १४०॥
काकचञ्चुवदास्येन शीतलं सलिलं पिबेत्।
प्राणापानविधानेन योगी भवति निर्जरः॥ १४१॥
रसनातालुयोगेन योऽमृतं सततं पिबेत्।
अब्दार्द्धेन भवेत्तस्य सर्वरोगपरिक्षयः॥ १४२॥
विशुद्धे परमे चक्रे धृत्वा सोमकलाजलम्।
उन्मार्गेण कृतं याति वञ्चयित्वा खेर्मुखं ॥ १४३॥
वि शब्देन स्मृतो हंसो निर्मलं शुद्धमुच्यते।
अतः कण्ठे विशुद्धाख्ये चक्रं चक्रविदो विदुः॥ १४४॥
अमृतं कन्दरे कृत्वा नासान्तसुषिरे क्रमात्।
स्वयमुच्चालितं याति वर्जयित्वा खेर्मुखं ॥ १४५॥
बद्धं सोमकलाजलं सुविमलं कण्ठस्थलादूर्ध्वतो
नासान्ते सुषिरे याति गगनद्वारं ततः सर्वतः।
ऊर्ध्वास्यो भुवि सन्निपत्य नितरामुत्तानगात्रः पिब
त्येवं यो विबुद्धो जितेन्द्रियगणो नैवास्ति तस्य क्षयः॥ १४६॥
उर्ध्वजिह्वः स्थिर भूत्वा सोमपनां करोति यः।
अब्दार्धेन न सन्देहो मृत्युं जयति योगवित्॥ १४७॥
बद्धम् मूलबिल येन तेन विघ्नो विदारितः।
अजरामरमाप्नोति यथा पञ्चमुखो हरः॥ १४८॥
संपीड्य रसनाग्रेण राजदन्तबिलं महत्।
ध्यात्वामृतमयीं देवीं षण्मासेन सुकविर्भवेत्॥ १४९॥
सर्वद्वाराणि बध्नाति यदूर्ध्वं च बिलं स्थितम्।
न मुञ्चत्यमृतं क्वापि स य्था यत्र धारणात्॥ १५०॥
चुम्बन्ती यदि लम्बिकाग्रमनिशं जिह्वा रसस्यन्दिनी
स्वीकारादुदकस्य दुग्धसदृशो मिष्टाज्यतुल्यस्य च।
व्याधीनां जरणं जरापहरणं शास्त्रागमोदगीरणं
तस्य स्यादमरत्वमष्टगुणितं दिव्यांगनाकर्षणम्॥ १५१॥
अणिमा महिमा चैव गरिमा लघिमा तथा।
ईशित्व च वशित्वं च प्राप्तिः प्राकाम्यमेवा च॥ १५२॥
अमृतापूर्णदेहस्य योगिनो द्वित्रिवत्सरैः।
ऊर्ध्वं प्रवर्तते रेतो ह्यणिमादि गुणोदयम्॥ १५३॥
नित्यं सोमकलपूर्णं शरीरं यस्य योगिनः।
तक्षकेणापि सदष्टं त विषं न च पीडयेत्॥ १५४॥
ईन्धनानि यथा वह्निस्तैलवर्तिं च दीपकः।
तथा सोमकलापूर्णं देहं देही न मुञ्चति॥ १५५॥
आसनेन समायुक्तः प्राणायामेन संयुतः।
प्रत्याहारेण सम्पन्नो धारणां च समभ्यसेत्॥ १५६॥
हृदये पञ्चभूतानां धारणा च पृथक् पृथक्।
मनसो निश्चलत्वेन धारणा साभिधीयते॥ १५७॥
य पृथ्वी हरितालहेमरुचिरा पीता लकारान्विता
संयुक्ता कमलासनेन हि चतुष्कोणा हृदि स्थायिनी।
प्राणां तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितात् धारये
देषा स्तम्भकरी सदाक्षितिजयं कुर्यद् भुवो धारणा॥ १५८॥
आर्द्धेन्दुप्रतिमं च कुन्दधवलं कण्ठेऽम्बुतत्त्वं स्थितं
तत्पीयूषवकारबीजसहितं युक्तं सदा विष्णुना।
प्राण तत्र विलीय पञ्चघटिकाष्चित्तानिवितं धारये
देषा दुःसहकालकूटदहनी स्याद्वारुणी धारणा॥ १५९॥
यत्तालुस्थितमिन्द्रगोपसदृशं तत्त्वं त्रिकोणं ज्वलम्
तेजोरेफ़युक्तं प्रवालरुचिरं रुद्रेण यत्सङ्गतम्।
प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये
देषा वह्निजयं सदाविदधती वैश्वानरी धारणा॥ १६०॥
यद् भिन्नाञ्जनपुञ्जसन्निभमिदं वृतं भ्रुवोरन्तरे
तत्त्वं वायुमयं यकारसहितं तत्रेश्वरो देवता।
प्राणं तत्रविलीय पञ्चघटिकं चित्तान्वितं धारये
देषा रवे गमनं करोति यमिनां वै वायवी धारणा॥ १६१॥
आकाशं सुविशुद्धवारिसदृशं यद् ब्रह्मरन्ध्रे स्थितं
यन्नाथेन सदाशिवेन सहितं शान्तं हकाराक्षरम्।
प्राणं तत्र विलीया पञ्चघटीकं चित्तन्वितं धारये
देषा मोक्षकपाटपाटनपतुः प्रोक्ता नभोधारणा॥ १६२॥
स्तम्भिनी द्राविणी चैव दाहिनी भ्रामिणी तथा।
शोषिणी च भवात्येषा भूतानां पञ्च धारणाः॥ १६३॥
कर्मणा मनसा वाचा धारणाः पञ्च दुर्लभाः।
विज्ञान सततं योगी सर्वदुःखैः प्रमुच्यते॥ १६४॥
सर्वं चिन्तासमावर्ति योगिनो हृदि वर्तते।
या तत्वे निश्चला चिन्ता तद्धि ध्यानं प्रचक्षते॥ १६५॥
द्विधा भवति तद् ध्यानं सगुणं निर्गुणं तथा।
सगुणं वर्णंभेदेन निर्गुणं केवल विदुः॥ १६६॥
अश्वमेध्सहस्राणि वाजपेयशतानि च।
एकस्य ध्यानयोगस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १६७॥
आधारे प्रथमे चक्रे स्वर्णाभे च चतुरङ्गुले।
नासाग्रदृष्टिरात्मानां ध्यात्वा योगी सुखी भवेत्॥ १६८॥
स्वाधिष्ठाने शुभे चक्रे सन्माणिक्यसमप्रभे।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा ब्रह्मसमो भवेत्॥ १६९॥
तरुणादित्यसंकाशे चक्रे तु मणिपूरके।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा संक्षोभयेज्जगत्॥ १७०॥
अनाहते महाचक्र द्वादशारे च पन्कजे।
नासाग्रे दृष्टिमाधाय ध्यात्वा ध्यातामरो भवेत्॥ १७१॥
सततं घणिटकामध्ये विशुद्धे दीपकप्रभे।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा दुःखं विमुञ्चति॥ १७२॥
स्रवत्पीयूषसम्पूर्णे लम्बिकाचन्द्रमण्ङ्दले।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा मृत्युं विमुञ्चति॥ १७३॥
ध्यायन्नीलनिभं नित्यं भूरमध्ये परमेश्वरम्।
आत्मानं विजितप्राणो योगी योगमवाप्नुयात्॥ १७४॥
ब्रह्मरन्ध्रे महाचक्रे सहस्रारे च पन्कजे।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा सिद्धो भवेत्स्वयम्॥ १७५॥
निर्मलं गगनाकारं मरीचिजलसन्निभम्।
आत्मानं सर्वगंध्यात्वा योगी मुक्तिमवाप्नुयात्॥ १७६॥
गुदं मेढ्रश्च नाभिश्च हृदयं कण्ठ  ऊर्ध्वगः।
घण्टिका लंबिकास्थानं भ्रूमध्यं च नभोबिलम्॥ १७७॥
कथितानि नवैतानि ध्यानस्थानानि योगिनाम्।
उपाधितत्वमुक्तानां कुर्वन्त्यष्टगुणोदयम्॥ १७८॥
उपाधिश्च तथा तत्त्वं द्वयमेतदुदाहृतम्।
उपाधिः प्रोच्यते वर्णस्तत्वमात्माभिधीयते॥ १७९॥
उपाधेरन्यथा ज्ञान तत्वसंस्थितिरन्यथा।
अन्यथ वर्णयोगेन दृश्यते स्फटिकपमम्॥ १८०॥
समस्तोपधिविध्वंसात्सदाभ्यासेन योगिनः।
मुक्तिकृच्छक्तिभेदेन स्वयमात्मा प्रकाशते॥ १८१॥
विरजाः परमाकशादात्माकाशो महत्तरः।
सर्वंदेत्थ भावनया तत्वं योगिजना विदुः॥ १८२॥
एतद् ब्रह्मात्मकं तेजः शिवं ज्योतिरनुत्तमम्॥
ध्वात्वा ज्ञात्वा विमुक्तः स्यादिति गोरक्षभाषितम्॥ १८३॥
शब्दादीनां च तन्मात्रा यावत्कर्णादिषु स्थिताः।
तावदेव स्मृतं ध्यानं समाधिः प्राणसंयमात्॥ १८४॥
धारण पञ्चनाडीभिर्ध्यानं स्यत् षष्टिनाडीभिः।
दिनद्वादशकेनैव समाधिः प्राणसंयमात्॥ १८५॥
यत्समत्वं द्वयोरत्र जीवात्मपरमात्मनोः
समस्तनष्टसंकल्पः समाधि सोऽभिधीयते॥ १८६॥
अंबुसैंधवयोरैक्यं यथा भवति योगतः।
तथात्ममनसोरैक्यं समाधिरभिधीयते॥ १८७॥
यदा संलीयते जीवो मानसं च विलीयते।
तदा समरसत्वं हि समाधिरभिधीयते॥ १८८॥
इन्द्रियेषु मनोवृत्तिरपरा प्रक्रिया हि सा।
ऊर्ध्वमेव गते जीवे न मनो नेन्द्रियाणि च १८९॥
नाभिजानाति शीतोष्ण न दुःखं न सुखं तथा।
न मानं नापमानं च योगी युक्तः समाधिना॥ १९०॥
न गन्धं न रसं रूपं न च स्पर्शं न निःस्वनम्।
नात्मानं न परं वेत्ति योगी युक्तः समधिना॥ १९१॥
अभेद्यः सर्वशस्त्राणाग्वध्यः सर्वदेहिनाम्।
अग्राह्यो मंत्रयंत्राणां योगी युक्तः समाधिना॥ १९२॥
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुखहा॥ १९३॥
निराद्यन्तं निरालम्बं निष्प्रपञ्चं निराश्रयम्।
निरामयं निराकारमचलं निर्गुणं महत्॥ १९४॥
हेतुदृष्टान्तनिर्मुक्तः मनोबुद्ध्याद्यगोचरम्।
योगविज्ञानमानन्दं ब्रह्म ब्रह्मविदो विदुः॥ १९५॥
निरालम्बे निराधारे निराकारे निरामये।
योगी योगविधानेन परब्रह्मणि लीयते॥ १९६॥
यथा घृते घृतं क्षिप्तं घृतमेव हि जायते।
क्षीरे क्षीरं तथा योगी तत्त्वमेव हि जायते॥  १९७॥
दुग्धे क्षीरं धृते सर्पिरग्नौ वह्निरिवार्पितः।
तन्मयत्वं व्रजत्येवं योगी लीनः परे पदे॥ १९८॥
भवभयदवमुक्तिं नाकसोपानमार्गं
प्रकटितपरमार्थं ग्रन्थमेनं सुगुह्यम्।
सकृदपि पठतीत्थं यः प्रशस्तप्रबोधं
स भवति भुवि मान्यो भाजनं मोक्षलक्षम्याः॥ १९९॥
नृणां भवभयहरं  मुक्तिसोपानलक्षणम्।
गुह्याद् गुह्यतरं चेदं गोरक्षेण प्रकाशितम्॥ २००॥
इति गोरक्षसनाथोक्तं योगशास्त्रं जनः पठेत्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो योगी सिद्धो भवेद् ध्रुवम्॥ २०१॥
योगशास्त्रं पठेन्नित्यं किमान्यैः शास्त्रविस्तरैः।
यत्स्वयं चादिनाथस्य निर्गतं वदनाम्बुजात्॥ २०२॥
स्नातं तेन समस्ततीर्थसलिले दत्तां महीमण्डलम्
यज्ञानां च कृतं सहस्रमयुतं देवाश्च सम्पूजिताः।
सत्यं तेन सुतर्पिताश्च पितरः स्वर्गं च नीताः पुन
यस्य ब्रह्मविचारणे क्षणमपि प्राप्नोतिधैर्यं मनः॥ २०३॥
॥ इति श्रीमत्सिद्धवर्य श्रीगोरक्षनाथ विरचित विवेक मार्तण्डाभिधानं योगशास्त्रं सम्पूर्णम्॥